अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति में आए बदलाव ने भारत को फिलहाल बड़ी राहत दी है। रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर भारी शुल्क लगाने की योजना से शुरू हुआ मामला पहले 500 फीसदी तक के प्रस्ताव, फिर 100 फीसदी टैरिफ के प्रावधान और अब अस्थायी छूट तक पहुंच गया है। 16 अक्टूबर 2026 को ट्रंप ने संबंधित प्रतिबंधों और शुल्क प्रावधानों के लागू होने पर रोक लगाने का आदेश दिया। इससे भारत पर रूसी तेल खरीद को लेकर नए अमेरिकी टैरिफ का तत्काल खतरा टल गया है। हालांकि, यह स्थायी छूट नहीं है और भविष्य में अमेरिकी नीति फिर बदल सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह है कि अमेरिका ने पहले इतनी सख्त कार्रवाई की तैयारी क्यों की, टैरिफ का प्रस्ताव कैसे बदला और आखिर भारत को राहत कैसे मिली? इसे समझने के लिए अमेरिकी प्रतिबंध कानून, रूस से तेल खरीदने की रणनीति और भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता-तीनों को एक साथ देखना होगा।
500 फीसदी टैरिफ की चर्चा कहां से शुरू हुई?
अमेरिका और भारत के बीच टैरिफ विवाद का यह चरण रूस से तेल खरीदने के मुद्दे से जुड़ा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए कई प्रतिबंध लगाए। अमेरिका में भी ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश हुई, जिसके तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले बड़े देशों के अमेरिकी बाजार में निर्यात पर भारी शुल्क लगाया जा सके। शुरुआती प्रस्ताव में रूस से ऊर्जा उत्पाद खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक टैरिफ लगाने का विकल्प शामिल था। इसका मकसद ऐसे देशों के लिए अमेरिकी बाजार में कारोबार करना महंगा बनाना और रूस की ऊर्जा आय पर दबाव बढ़ाना था। हालांकि, बाद में पारित कानून में 100 फीसदी टैरिफ का प्रावधान सामने आया। इस तरह 500 फीसदी की चर्चा से मामला 100 फीसदी के कानूनी प्रावधान तक पहुंचा।
100 फीसदी टैरिफ का प्रावधान क्या था?
रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से संबंधित लिंडसे ग्राहम कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने की शक्ति दी गई। इसके दायरे में भारत और चीन जैसे बड़े आयातक देश भी आ सकते थे। यह समझना जरूरी है कि कानून में 100 फीसदी टैरिफ का प्रावधान होने का मतलब यह नहीं था कि भारत पर उसी समय अपने आप यह शुल्क लग गया। इसके लिए कानून में निर्धारित शर्तों और राष्ट्रपति की कार्रवाई की जरूरत थी। अमेरिकी कदम से भारतीय निर्यातकों को आशंका थी कि यदि इतना भारी शुल्क लागू होता है, तो अमेरिका में भारतीय उत्पाद महंगे हो सकते हैं। इससे कपड़ा, इंजीनियरिंग सामान और अन्य निर्यात क्षेत्रों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने का जोखिम रहता।
फिर भारत को राहत कैसे मिली?
16 अक्टूबर को ट्रंप ने संबंधित कानून के कुछ शुल्क और प्रतिबंध प्रावधानों को अस्थायी रूप से लागू न करने का आदेश दिया। अमेरिकी प्रशासन ने इस कदम के लिए राष्ट्रीय हितों का हवाला दिया। इससे भारत सहित रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने का तत्काल खतरा टल गया।
इस फैसले के पीछे कई परिस्थितियां अहम मानी जा रही
- ऊर्जा की बढ़ती कीमतें: कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से अमेरिका में ईंधन की लागत और महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। ऐसे समय में रूसी ऊर्जा की आपूर्ति पर सख्ती का असर वैश्विक बाजार पर भी पड़ सकता है।
- अमेरिका के अपने हित: रूसी ऊर्जा पर प्रतिबंधों को सख्ती से लागू करने और ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना वॉशिंगटन के लिए चुनौती है।
- भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता: दोनों देश व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भारत पर नए भारी टैरिफ का जोखिम द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को प्रभावित कर सकता था।
इन परिस्थितियों को फैसले की संभावित वजहों के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि भारत को राहत केवल किसी एक कारण से मिली।
क्या अब भारत पर अमेरिकी टैरिफ जीरो हो गया है?
यहां सबसे जरूरी बात समझनी होगी। रूसी तेल खरीदने को लेकर संभावित 100 फीसदी टैरिफ पर अस्थायी रोक का मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने भारत के सभी सामानों पर टैरिफ खत्म कर दिया है।
फरवरी 2026 में घोषित भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के ढांचे में भारतीय सामानों की कई श्रेणियों पर अमेरिकी पारस्परिक टैरिफ दर 18 फीसदी करने की बात कही गई थी। कुछ उत्पादों को अलग-अलग प्रावधानों के तहत शुल्क में छूट भी मिल सकती है। लेकिन यह व्यवस्था रूसी तेल से जुड़े प्रतिबंध कानून से अलग है।