मिडिल ईस्ट में जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष अब सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका असर दुनिया की रसोई तक पहुंच चुका है। खाने-पीने की चीजों के दाम 6 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गए हैं, जिससे वैश्विक महंगाई का दबाव बढ़ गया है। अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि यह युद्ध 40 दिनों से ज्यादा खिंचता है, तो आने वाले समय में खाद्य संकट और गहरा सकता है।
वैश्विक बाजार में महंगाई का दबाव बढ़ा
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने वैश्विक बाजारों को हिला दिया है। ऊर्जा कीमतों में तेजी के चलते खाने-पीने की चीजों की लागत भी बढ़ गई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय खाद्य कीमतें लगातार दूसरे महीने बढ़ी हैं, जिससे साफ संकेत मिल रहा है कि दुनिया महंगाई के एक नए दौर में प्रवेश कर रही है।
तेल संकट बना मुख्य वजह
इस बढ़ती महंगाई के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है। होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्ग प्रभावित होने से तेल सप्लाई बाधित हुई है। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्ट और उत्पादन लागत पर पड़ा है, जिससे खाद्य वस्तुएं महंगी हो गई हैं। ऊर्जा संकट ने हर सेक्टर को प्रभावित किया है।
गेहूं-मक्का से लेकर तेल तक सब महंगा
खाद्य वस्तुओं की बात करें तो गेहूं और मक्का की कीमतों में तेजी दर्ज की गई है। इसके अलावा वनस्पति तेल में सबसे ज्यादा उछाल देखा गया है। डेयरी उत्पाद, मीट और चीनी की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज हुई है। इसका मतलब है कि आम उपभोक्ता की थाली पर सीधा असर पड़ रहा है।
किसानों के फैसले से बढ़ेगी चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध लंबा चलता है, तो किसान अपनी रणनीति बदल सकते हैं। खाद की महंगाई के कारण किसान कम बुवाई कर सकते हैं या सस्ती फसलों की ओर रुख कर सकते हैं। इससे आने वाले महीनों में उत्पादन घट सकता है, जो खाद्य आपूर्ति को प्रभावित करेगा।
40 दिन से लंबी जंग बनी तो गहराएगा संकट
अर्थशास्त्रियों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि यह संघर्ष 40 दिनों से ज्यादा जारी रहता है, तो इसका असली असर बाद में दिखेगा। फिलहाल कीमतों में बढ़ोतरी चिंताजनक जरूर है, लेकिन स्थिति और बिगड़ सकती है। लगातार दबाव बना रहा, तो वैश्विक स्तर पर खाद्य महंगाई बड़ा संकट बन सकती है।