भारतीय कपड़ा और परिधान उद्योग इन दिनों गहरी चिंता में है। अमेरिका पहले ही भारतीय सामानों पर 50 फीसदी टैरिफ लगा चुका है और अब इसमें 500 फीसदी तक बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी नेताओं के हालिया बयानों के बाद उद्योग में हड़कंप मच गया है। अगर यह फैसला लागू होता है तो इसे सामान्य टैक्स नहीं बल्कि सीधे तौर पर निर्यात पर रोक जैसा माना जा रहा है।
500 फीसदी टैरिफ की आशंका क्यों
अमेरिका में एक प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी टैरिफ लगाया जा सकता है। इस सूची में भारत का नाम भी आ रहा है। यही वजह है कि भारतीय उद्योग खासकर कपड़ा सेक्टर सतर्क हो गया है। कंपनियों का कहना है कि इतनी भारी दर पर टैरिफ लगने से अमेरिका को निर्यात करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा।
कपड़ा उद्योग पहले से दबाव में
भारतीय कपड़ा उद्योग पहले ही मुश्किल दौर से गुजर रहा है। पिछले साल अमेरिका द्वारा 50 फीसदी टैरिफ लगाए जाने के बाद कंपनियों को भारी छूट देनी पड़ी। कई निर्यातकों ने घरेलू बाजार का रुख किया तो कुछ ने पड़ोसी देशों के जरिए ऑर्डर भेजने की कोशिश की। इसके बावजूद मुनाफा घटता गया और लागत बढ़ती चली गई।
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अमेरिका पर कितनी निर्भरता
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने करीब 37 अरब डॉलर का कपड़ा और परिधान निर्यात किया। इसमें से लगभग 28 से 30 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका को गया। यानी अमेरिकी बाजार बंद होने का मतलब है कि उद्योग की बड़ी कमाई पर सीधा असर। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच अपैरल एक्सपोर्ट में मामूली बढ़ोतरी हुई, लेकिन टेक्सटाइल निर्यात में गिरावट दर्ज की गई।
कारखानों के सामने बड़ा सवाल
उद्योग से जुड़े लोग साफ कह रहे हैं कि उत्पादन रोकना संभव नहीं है। कोलकाता की एक बड़ी कपड़ा मिल में हजारों मजदूर काम करते हैं। प्रबंधन का कहना है कि उन्होंने पतझड़ और सर्दियों के सीजन के लिए उत्पादन शुरू कर दिया है। लेकिन अगर 500 फीसदी टैरिफ लागू हुआ तो अमेरिका को निर्यात बंद हो जाएगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कारखाने कैसे चलेंगे और मजदूरों को काम कैसे मिलेगा।
तिरुपुर से लेकर देशभर में तनाव
देश के निटवेअर निर्यात का बड़ा हिस्सा तिरुपुर से होता है और वहां पहले से ही तनाव के संकेत दिखने लगे हैं। अमेरिकी खरीदार भारतीय कंपनियों के विकल्प तलाश रहे हैं। उद्योग को डर है कि अगर यह अनिश्चितता लंबे समय तक बनी रही तो ऑर्डर दूसरे देशों में शिफ्ट हो जाएंगे। कुल मिलाकर, कपड़ा उद्योग के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी होती दिख रही है।