
भारतीय सनातन संस्कृति में परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। परिक्रमा का अर्थ है किसी पवित्र स्थल या देवस्थान के चारों ओर श्रद्धा और भक्ति से घूमना। इन्हीं परिक्रमाओं में सबसे पवित्र मानी जाती है 84 कोस परिक्रमा, जो विशेष रूप से ब्रजभूमि से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इसी क्षेत्र में अपने बाल और युवा लीला की थी। यह परिक्रमा मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, नंदगांव, बरसाना, और गोकुल सहित सम्पूर्ण ब्रज मंडल की परिक्रमा के रूप में की जाती है।
पापों से मुक्ति का अद्भुत साधन
शास्त्रों के अनुसार, 84 कोस परिक्रमा करने से व्यक्ति के जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह परिक्रमा आत्मशुद्धि और आत्मबोध का एक महान साधन मानी गई है। भक्तजन मानते हैं कि ब्रजभूमि में उठाया गया प्रत्येक कदम भगवान श्रीकृष्ण के चरणों तक पहुँचने का माध्यम बनता है। यही कारण है कि हर वर्ष हजारों श्रद्धालु इस परिक्रमा में सम्मिलित होकर अपने जीवन को पुण्य से भरते हैं।
84 कोस परिक्रमा का धार्मिक महत्व
84 कोस परिक्रमा केवल एक आध्यात्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भक्ति, अनुशासन और तप का संगम है। इसकी कुल लंबाई लगभग 252 किलोमीटर मानी जाती है, जिसे श्रद्धालु 40 से 50 दिनों में पूरा करते हैं। इस यात्रा के दौरान भक्त ब्रजभूमि के सभी तीर्थस्थलों का दर्शन करते हैं—जहाँ-जहाँ श्रीकृष्ण ने गोचारण, रासलीला, और लीलाएँ की थीं। इस यात्रा से न केवल धार्मिक पुण्य प्राप्त होता है, बल्कि मन, वचन और कर्म से भी पवित्रता का अनुभव होता है।
परिक्रमा की विधि और नियम
84 कोस परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले श्रद्धालु संकल्प लेते हैं और भगवान श्रीकृष्ण का नाम स्मरण करते हुए यात्रा आरंभ करते हैं। परिक्रमा के दौरान सात्विक आहार, ब्रह्मचर्य और भजन-संकीर्तन का पालन किया जाता है। हर पड़ाव पर भक्त जन मंदिरों में दर्शन करते हैं, कथा-कीर्तन सुनते हैं और ब्रज की पावन मिट्टी का तिलक लगाते हैं।