भारतीय न्यायिक प्रणाली के इतिहास में एक अध्याय जुड़ने वाला है। केंद्रीय कैबिनेट ने देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दिखा दी है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की कुल संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने की तैयारी हो रही है। यह संख्या मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर तय की गई है. इस अहम बदलाव को लेकर केंद्र सरकार आगामी सत्र में सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेज) संशोधन विधेयक 2026 करने जा रही है। इस विधेयक मूल रूप से 1956 के कानून में संशोधन जो समय-समय पर जजों की संख्या को तय करने के आधार पर होगा।
सरकार की योजना क्या है
. कैबिनेट की मंजूरी: केंद्रीय कैबिनेट ने जजों की संख्या में बढ़ोतरी को लेकर अधिकारिक तौर पर मंजूरी दे दी है।
· संख्या में बढ़ोतरी: वर्तमान समय में स्वीकृत 33 पदों को बढ़ाकर अब 37 कर दिया जाएगा।
· कानूनी संशोधन: सरकार ‘सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेज) अमेंडमेंट एक्ट’ के माध्यम से 1956 के पुराने कानून में बदलाव लाने वाली है।
वित्तीय प्रावधान: जजों और उनके सहयोगी स्टाफ पर होने वाला सारा खर्च भारत के कंसोलिडेटेड फंड (Consolidated Fund of India) से वहन होगा।
· ऐतिहासिक विकास: 1956 में सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या मात्र 10 थी, जो विभिन्न चरणों में बढ़ते हुए अब 37 (CJI के अलावा) तक पहुँचने वाली है.
क्यों जरूरी है फैसला?
1. लंबित मामलों का बोझ कम हो जाएगा: सुप्रीम कोर्ट में वर्तमान लंबित मामलों की संख्या में काफी अधिक है। इन्हें निपटाना बड़ी चुनौती की तरह है। जजों की संख्या को बढ़ाने से अधिक संवैधानिक बेंचों और नियमित बेंचों का गठन हो सकेगा।
2. जल्द न्याय: लोगों को जल्द न्याय मिलेगा। सरकार का स्पष्ट कहना है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से सुनवाई में काफी गति आएगी।
3. बदलती न्यायिक आवश्यकता: जैसे-जैसे देश की जनसंख्या और कानूनी विवादों की प्रकृति में बदलाव हुआ है। शीर्ष अदालत पर काम का दबाव तेजी से बढ़ा है। 1956 की तुलना में आज की जरूरतें काफी अधिक व्यापक हैं। इसे देखते हुए विस्तार जरूरी हो गया था।