अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी रिपब्लिकन पार्टी को बड़ा राजनीतिक झटका लगा है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) और सीनेट, दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लिया है। इस नतीजे के साथ ही अमेरिकी संसद में सत्ता का संतुलन बदल गया है। हालांकि चुनाव में हार के बावजूद ट्रंप राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे और उनका कार्यकाल जारी रहेगा, लेकिन अब उनके लिए अपनी नीतियों और चुनावी वादों को लागू करना पहले जितना आसान नहीं होगा। खास बात यह है कि मिडटर्म चुनाव को ट्रंप की सरकार के कामकाज पर जनता के फैसले के रूप में भी देखा जा रहा है।
कांग्रेस पर डेमोक्रेट्स का कब्जा, ट्रंप के सामने नई चुनौती
अमेरिकी मिडटर्म चुनाव के नतीजों ने वाशिंगटन की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी से प्रतिनिधि सभा और सीनेट दोनों का नियंत्रण छीन लिया है। इससे पहले ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दो वर्षों में रिपब्लिकन पार्टी को दोनों सदनों में बहुमत हासिल था। इसी वजह से राष्ट्रपति को अपने कई फैसलों और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में अपेक्षाकृत कम विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है। जनवरी में नई कांग्रेस के कार्यभार संभालने के बाद डेमोक्रेट्स को विधायी प्रक्रिया और संसदीय समितियों में महत्वपूर्ण भूमिका मिल जाएगी।
कानून बनाने से लेकर बजट तक हर कदम पर होगी मुश्किल
डेमोक्रेट्स के बहुमत में आने का सबसे बड़ा असर ट्रंप के नीतिगत फैसलों पर पड़ सकता है। अब राष्ट्रपति को नए कानून पारित कराने, सरकारी खर्च से जुड़े प्रस्तावों और बजट को मंजूरी दिलाने के लिए विपक्ष के साथ बातचीत करनी होगी। डेमोक्रेट्स ट्रंप प्रशासन की कई नीतियों का विरोध कर चुके हैं। ऐसे में टैक्स, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी खर्च और आव्रजन जैसे मुद्दों पर दोनों पार्टियों के बीच टकराव बढ़ने की आशंका है। हालांकि राष्ट्रपति के पास किसी विधेयक को वीटो करने का अधिकार रहेगा, लेकिन इसका इस्तेमाल भी राजनीतिक गतिरोध को और गहरा कर सकता है।
ट्रंप प्रशासन के खिलाफ जांच और महाभियोग की चर्चा तेज
चुनावी नतीजों के बाद ट्रंप प्रशासन की मुश्किलें केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं रहने वाली हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी को अब संसदीय समितियों के माध्यम से सरकारी फैसलों की जांच करने, अधिकारियों को पूछताछ के लिए बुलाने और दस्तावेज मांगने का अधिकार मिलेगा। इससे ट्रंप प्रशासन के कई विवादित फैसले राजनीतिक बहस के केंद्र में आ सकते हैं। विपक्षी नेताओं ने जवाबदेही को अपनी प्राथमिकता बताया है। महाभियोग की संभावना को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है, हालांकि केवल प्रतिनिधि सभा में महाभियोग प्रस्ताव पारित होना राष्ट्रपति को पद से हटाने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सीनेट में दो-तिहाई बहुमत से दोषसिद्धि जरूरी है।
अर्थव्यवस्था और ईरान युद्ध का भी पड़ा चुनाव पर असर
इन चुनावों में महंगाई, बढ़ती जीवनयापन लागत और ईरान के साथ जारी युद्ध जैसे मुद्दों ने मतदाताओं के फैसले को प्रभावित किया। रिपोर्टों के मुताबिक, युद्ध के कारण ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी और आर्थिक दबाव को लेकर लोगों में नाराजगी थी। डेमोक्रेट्स ने इन्हीं मुद्दों को चुनाव प्रचार में प्रमुखता से उठाया। नतीजों के बाद ट्रंप ने भी स्वीकार किया कि ईरान युद्ध ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रदर्शन को नुकसान पहुंचाया। अब आने वाले दो वर्षों में ट्रंप को विपक्ष के साथ तालमेल बैठाकर सरकार चलानी होगी। राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियां बरकरार रहेंगी, लेकिन संसद में बहुमत नहीं होने के कारण उनका राजनीतिक प्रभाव और नीतिगत फैसलों पर नियंत्रण सीमित हो सकता है। इसीलिए अमेरिकी राजनीति में ट्रंप के शेष कार्यकाल को चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।