मेरठ। मेरठ की ऐतिहासिक भूमि अपने अदम्य साहस और संघर्षों के लिए जानी जाती है, लेकिन पिछले दो दिनों में इस पावन धरा से न्याय का एक ऐसा शंखनाद हुआ है, जिसने हर संवेदनशील दिल को सुकून और जुर्म की दुनिया को गहरा झटका दिया है। महज 48 घंटों के भीतर, दो अलग-अलग अदालतों के न्यायाधीशों ने दो खौफनाक मुकदमों में अपनों के खून से हाथ रचने वाली पत्नियों और उनके प्रेमियों को मृत्युदंड की सजा सुनाई। देखा जाए तो यह केवल दो कानूनी फैसले नहीं हैं, बल्कि यह उस भरोसे की जीत है जो इस देश का आम इंसान कानून और न्यायपालिका पर रखता है।
नीले ड्रम में जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा द्वितीय और सांपकांड जिला एवं सत्र न्यायाधीश जयवीर सिंह नागर क्रांतिकारियों की धरती पर आजादी के बाद दो बड़े फैसले सुनाए है। ऐसा मेरठ के इतिहास में पहली बार हुआ है, जब दो दिन के अंतराल में दोनों न्यायधीशों ने दो महिलाओं समेत चार को मुत्युदंड की सजा सुनाई है। देखा जाए तो कानून की किताब में मृत्युदंड को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन जब जुर्म की बर्बरता इंसानियत की हर सीमा लांघ जाती है, तो न्यायपालिका निष्पक्षता दर्शाती है पर उसका तराजू सिर्फ और सिर्फ मुकम्मल न्याय तोलता है। वरिष्ठ अधिवक्ता अजय त्यागी का कहना था कि न्याय में देरी भले ही पीड़ा देती हो, लेकिन जब फैसला मजबूती से आता है तो वह समाज में फैली बुराई और खौफ पर सबसे करारा वार करता है। ऐसे दो दिन आए मुत्युदंड के फैसलों समाज में फैली बुराई को खत्म करने के लिए बड़ा संदेश दिया है।
हमारी आत्मा को शांति मिली है
शुक्रवार को सांपकांड में फैसला आते ही अमित की मां मुनेश अदालत में फफक रो पड़ी। अदालत से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा, उन्हें फांसी की सजा मिल गई। इससे हमारी आत्मा को शांति मिली है और हमारे बच्चे को भी इंसाफ मिला है। हमें उम्मीद थी कि अदालत हमें न्याय देगी। अदालत ने सही फैसला सुनाया है। अमित के तीनों बच्चों को पालूंगी, जैसे भी मुझसे हो सकेगा। जब उन्होंने मेरे बच्चे के बारे में नहीं सोचा, तो मैं उनके बच्चों को जरूर पालूंगी। हम अपने केस के फैसले से बहुत खुश हैं कि उन्हें फांसी की सजा मिली। अमित के भाई सोनू ने कहा, वे अदालत के फैसले से बहुत खुश हैं। आरोपियों ने जिस तरह का अपराध किया, उसके लिए उन्हें फांसी की सजा ही मिलनी चाहिए थी, ताकि भविष्य में ऐसा अपराध करने से पहले कोई भी सौ बार सोचे।
सोनू ने बताया, अमित की दो बेटियां और एक बेटा है। तीनों का पालन-पोषण परिवार के लोग और उनके चाचा मजदूरी करके कर रहे हैं। अगर दोषी इस फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हैं तो परिवार आगे भी कानूनी लड़ाई लड़ेगा।
समाज और अपराधियों के लिए एक सीधा पैगाम
आम नागरिक चाहे कितनी भी मुश्किल में हो, अदालतें उसकी ढाल बनकर खड़ी हैं। न्यायपालिका किसी भी जुल्मी को बख्शने के मूड में नहीं है। दो दिनों में चार फांसियों की सजा का यह संयोग नहीं है, बल्कि समाज के दो अलग-अलग वर्गों के लिए दो स्पष्ट संदेश है। यह अपराधियों के लिए भी चेतावनी है कि कानून के हाथ लंबे ही नहीं, बेहद सख्त भी होते हैं। अगर कोई यह सोचता है कि वह जुर्म करके बच निकलेगा तो न्यायिक गर्जना उसकी गलतफहमी दूर करने के लिए काफी है।
दोनों फैसलों को लंबे समय तक याद रखा जाएगा
अधिवक्ता संजीव कुमार का कहना है कि बुधवार के बाद शुक्रवार को नई सुबह हुई। उन्होंने कहा, नीले ड्रम और सांपकांड में फैसले सुनाए जा चुके हैं। पन्नों पर दस्तखत हो चुके हैं और न्याय की मुहर भी लग चुकी है। मेरठ में इन दो दिनों में जो लिखा गया यह न्यायिक इतिहास आने वाले लंबे समय तक याद रखा जाएगा। यह फैसला उन मासूमों को सच्ची श्रद्धांजलि है। साथ ही यह उन उम्मीदों की जीत है जो हर रोज न्याय की आस में अदालत में आते हैं।