हमारे देश में देवी के तमाम मंदिर हैं, 31मार्च 2025 को चैत्र नवरात्रि प्रारंभ होने जा रहा है । मध्य प्रदेश के सतना जिले में त्रिकूट पर्वत पर स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, इस जगह को हम सभी "महैर" के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि भगवान शिवशंकर की पहली पत्नी माता सती, दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं। दक्ष प्रजापति के द्वारा अपने पति शिव जी के अपमान से दुखी होकर, माता सती ने दक्ष प्रजापति के यहां चल रहे यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था, जिसके बाद शिव जी ने माता सती के शरीर को अपने कंधों पर उठाकर संसार में भ्रमण किया था । तब माता सती के अंग और जेवरात जहां जहां गिरे वहां वहां एक शक्ति पीठ की स्थापना हुई । मान्यता है कि जहाँ माता सती का हार गिरा वहां मां शारदा शक्ति पीठ बना ।मान्यता है, कि इसलिए इसे "माई का हार" यानी मैहर कहा जाता है । मैहर को माता देवी पार्वती के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भगवान शिव मृत माँ देवी, सती के शरीर को ले जा रहे थे , तो उनका हार इस स्थान पर गिरा और इसलिए इसका नाम “मैहर” पड़ा ।
पौराणिक मान्यता के अनुसार...
51 शक्तिपीठों में से एक मध्य प्रदेश के मैहर में त्रिकूट पर्वत की ऊंची चोटी पर मां शारदा देवी का पवित्र मंदिर है। माना जाता है कि सती का हार यहीं गिरा था। इस स्थान पर माता का एक भव्य मंदिर है। मैहर माता के मंदिर का इतिहास पुरापाषाण काल से जुड़ा है। यह मंदिर देवी पार्वती के 51 शक्तिपीठों में से एक है।
कैसे हुआ मंदिर का निर्माण....
शारदा देवी के इस मंदिर के बारे में अलग अलग कहानियां भी प्रचलित हैं। त्रिकूट पर्वत की चोटी बसा मां शारदा देवी का मंदिर । यह मंदिर एक शक्तिपीठ भी है। मां के इस मंदिर की कहानी बड़ी ही अद्भुत और रोमांच भरी हुई है। कहते हैं न कि सच्चे मन से मांगो तो ईश्वर ही मिल जाता है। ऐसा ही हुआ था मां के भक्त आल्हा के साथ। मान्यता है आल्हा देवी मां के भक्त थे, और जब आल्हा ने देवी मां का आर्शीवाद पाने के लिए दस वर्षों तक कठोर तपस्या की । दस वर्षों की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी मां ने उस पर प्रसन्न होकर दर्शन दिए। और आल्हा को चिरकाल तक अमरता का वरदान दिया। मान्यता है कि देवी मां ने ही आल्हा को स्वप्न में मूर्ति के बारे में बताया। उसके बाद आल्हा ने मां शारदा देवी के इस मंदिर का निर्माण कराया। तभी से मान्यता है, कि आल्हा आज भी जिंदा हैं, और देवी मां की पूजा- अर्चना सबसे पहले आल्हा ही करते आए हैं। कहते हैं कि जब प्रात:काल में मंदिर के पट खोले जाते हैं, तो वहां मां के चरणों में जल के साथ ही एक फूल चढ़ा हुआ मिलता है।
जिसने भी रात में रुकने की कोशिश की वो सुबह नहीं मिला...
हालांकि आज तक कोई भी आल्हा को देख नहीं पाया। देवी शारदा मंदिर के बारे में मान्यता है कि जो भी रात में इस मंदिर में आल्हा को देखने के लिए ठहरा है उसकी मृत्यु हो गई। इस डर के कारण रात में इस मंदिर में कोई नहीं ठहरता है। मंदिर के पुजारी भी यहां रात में नहीं ठहरते हैं। पुजारी बताते हैं मंदिर को खोलने का समय सुबह चार बजे का है। उससे पहले मंदिर के घंटों को तेज तेज बजाने की ध्वनि सुनाई देती है। मंदिर के पट खुलते ही देवी को देखकर लगता है, कि जैसे किसी ने उनकी पूजा अर्चना की हो।
आज भी है आल्हा ऊदल का अखाड़ा....
मंदिर परिसर से थोड़ी दूर पर आल्हा उदल का अखाड़ा भी स्थित है। इसके अलावा वहां एक तालाब है। इसके बारे में मान्यता है, कि दोनों भाई आल्हा और ऊदल इस सरोवर में स्नान किया करते थे। इसके बाद ही मां शारदा देवी के दर्शनों के लिए जाते थे। मंदिर आने वाले श्रद्धालु इस स्थान के भी दर्शन करने आते हैं।
मां शारदा देवी को चढ़ावे में पसंद है ये चीजे...
अगर आप भी चैत्र नवरात्रो में मां शारदा देवी के दर्शनों के लिए मैहर धाम की यात्रा पर जा रहे हैं, तो मां को चढ़ावे के लिए पान, सुपारी, ध्वजा, नारियल का चढ़ावा लेकर जाएं। मंदिर के पुजारी का कहना है कि मां शारदा देवी करुणामयी हैं। मां शारदा देवी अपने भक्तों की सम्पूर्ण मनोकामना पूर्ण करती हैं । माई के चरणों में पान, सुपारी, लाल चुनर, लाल सिंदूर, लाल चूड़ियां, ध्वजा, नारियल का चढ़ावा सब से उत्तम है, देवी मां इससे प्रसन्न होती हैं ।