हरीश की जिंदगी का 12 साल लंबा संघर्ष : गाजियाबाद के हरीश आज 12 साल से कोमा में हैं. एक गंभीर दुर्घटना के बाद उनकी हालत ऐसी हो गई कि वे सामान्य जीवन जीने में असमर्थ हो गए। इस लंबे समय से उनकी हालत ने परिवार और समाज में कई सवाल खड़े कर दिए। हरीश के परिवार ने इस लंबी पीड़ा को देखते हुए इच्छामृत्यु की मांग की है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है और देश भर में इच्छामृत्यु यानी “Right to Die with Dignity” पर चर्चा गर्म हो गई है.
सुप्रीम कोर्ट की तैयारी और कानूनी प्रक्रिया
हरीश के मामले में सुप्रीम कोर्ट अब अंतिम फैसला देने जा रहा है। कोर्ट में बहस के दौरान डॉक्टरों की रिपोर्ट, परिवार की अपील और कानूनी विशेषज्ञों के विचार रखे गए। अदालत इस बात पर विचार कर रही है कि क्या किसी व्यक्ति को स्वेच्छा से जीवन समाप्त करने का अधिकार दिया जा सकता है, खासकर जब उसका जीवन दीर्घकालिक पीड़ा और कोमा जैसी स्थिति में हो। यह फैसला न केवल हरीश के परिवार के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे देश के लिए एक कानूनी और नैतिक मिसाल साबित होगा.
इच्छामृत्यु पर देश में पहले से बनी राय
भारत में इच्छामृत्यु पर पहले भी कोर्ट में कई केस आए हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में एक फैसला दिया था, जिसमें Passive Euthanasia यानी जीवन सहायक चिकित्सा को रोकने का अधिकार दिया गया था। इसका मतलब है कि मरीज जो लंबे समय तक असहाय स्थिति में हैं, उन्हें जीवन समाप्त करने का निर्णय लेने का अधिकार मिल सकता है। हरीश के केस में सुप्रीम कोर्ट यह तय करेगा कि Active Euthanasia यानी सक्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए या नहीं.
हरीश की कहानी ने जगाई संवेदनाएँ
हरीश के मामले ने समाज और मीडिया में गहरी संवेदनाएँ जगाई हैं। उनके परिवार ने बताया कि पिछले 12 सालों में उन्होंने हर संभव इलाज करवाया, लेकिन हरीश की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। परिवार का कहना है कि वे चाहते हैं कि हरीश मानवीय तरीके से और सम्मान के साथ जीवन का अंत कर सकें। डॉक्टरों और समाजशास्त्रियों ने भी इस मामले पर चर्चा करते हुए कहा है कि ऐसे निर्णय में भावनात्मक, नैतिक और कानूनी पहलुओं को संतुलित करना बहुत जरूरी है.
फैसले की उम्मीद और भविष्य की दिशा
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सिर्फ हरीश या उनके परिवार तक सीमित नहीं रहेगा। इस फैसले से इच्छामृत्यु पर देश का कानून और सामाजिक दृष्टिकोण स्पष्ट होगा। अगर कोर्ट हरीश के पक्ष में निर्णय देती है, तो यह लंबे समय से कोमा या गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार बनेगा। वहीं, इसके खिलाफ फैसला आने पर भी यह मामला देश में नैतिक और कानूनी बहस को नई दिशा देगा। हरीश की कहानी ने दिखाया कि जीवन और मृत्यु के बीच निर्णय केवल व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी भी बन जाता है.