कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI अब सिर्फ मशीनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इंसानों के सोचने-समझने वाले कामों को भी चुनौती देने लगी है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि एआई से सबसे ज्यादा खतरा दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों की नौकरियों को है। फिक्की के ‘AI इंडिया’ सम्मेलन में उन्होंने साफ कहा कि अब एआई केवल शारीरिक श्रम वाले काम नहीं, बल्कि विश्लेषण, निर्णय और सोच-विचार से जुड़े कार्यों को भी तेजी से अपने दायरे में ले रहा है। इसका सीधा असर उन प्रोफेशनल्स पर पड़ेगा जो डेटा एनालिसिस, रिपोर्टिंग, प्लानिंग और निर्णय आधारित काम करते हैं।
औद्योगिक क्रांतियों से अलग है AI का खतरा
एस. कृष्णन ने बताया कि पिछली औद्योगिक क्रांतियों में बदलाव मुख्य रूप से शारीरिक कामों के ऑटोमेशन तक सीमित थे। मशीनों ने मेहनत वाले कामों को आसान बनाया, लेकिन इंसानी सोच की जगह नहीं ली। पहली बार ऐसा हो रहा है कि एआई सीधे तौर पर दिमाग से किए जाने वाले कामों को प्रभावित कर रहा है। रिपोर्ट बनाना, डाटा समझना, पैटर्न पहचानना और यहां तक कि रणनीति सुझाना जैसे काम अब एआई करने लगा है। यही वजह है कि ऑफिस और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों की चिंता बढ़ रही है और जॉब सिक्योरिटी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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भारत के लिए अवसर भी छुपा है
हालांकि एस. कृष्णन ने सिर्फ खतरे की बात नहीं की, बल्कि इसके साथ उम्मीद की तस्वीर भी दिखाई। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए एआई उत्पादकता बढ़ाने का बड़ा जरिया बन सकता है। उनका मानना है कि एआई से कुछ पारंपरिक नौकरियां जरूर प्रभावित होंगी, लेकिन नए सेक्टर में कहीं ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होंगे। खासकर टेक्नोलॉजी, एआई मैनेजमेंट, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल सर्विसेज जैसे क्षेत्रों में नई नौकरियां सामने आएंगी। सरकार का फोकस इस बात पर है कि एआई को डर नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखा जाए।
खतरे के साथ छुपा अवसर
सरकार का साफ मानना है कि एआई से होने वाले बदलाव का समाधान स्किल डेवलपमेंट है। एस. कृष्णन ने कहा कि नई नौकरियों का सृजन उन्नत कौशल विकास और प्रतिभा निर्माण के जरिए ही संभव है। उन्होंने चेतावनी दी कि कंपनियों को सिर्फ तात्कालिक फायदे पर ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि लंबे समय की चुनौतियों को भी समझना होगा। यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या उद्योग की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है। अगर समय रहते लोग खुद को अपस्किल नहीं करते, तो एआई का यह दौर उनके लिए मुश्किल बन सकता है।