पिछले महीने अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया बोइंग 787 विमान हादसे की जांच में एक अहम कदम आगे बढ़ा है. इस हादसे के बाद ब्लैक बॉक्स से डेटा निकालने में काफी देरी हुई थी, लेकिन अब अमेरिकी जांच एजेंसी NTSB (नेशनल ट्रांसपोर्टेशन सेफ्टी बोर्ड) से मंगाई गई खास किट और केबल्स की मदद से डेटा को सफलतापूर्वक रिकवर कर लिया गया है. अमेरिकी किट की मदद से जो डेटा मिला है, वह पूरे हादसे की कड़ी को जोड़ने में अहम साबित होगा. आने वाले समय में जांच एजेंसियां इस डेटा के आधार पर हादसे की असली वजह स्पष्ट रूप से सामने ला सकती हैं.
11 दिन बाद भारत पहुंची अमेरिकी किट
यह किट 23 जून 2025 को भारत लाई गई थी, यानी विमान हादसे के 11 दिन बाद. इसी किट से ब्लैक बॉक्स का डेटा डाउनलोड किया गया, जिसमें उड़ान से जुड़े कई अहम रिकॉर्ड मिले हैं. इससे पहले ब्लैक बॉक्स से डेटा निकालने में हो रही देरी को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे थे.
ब्लैक बॉक्स कब-कब बरामद हुए?
पहला ब्लैक बॉक्स विमान के पिछले हिस्से से 13 जून को मिला था, जो अहमदाबाद के बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल की छत पर पड़ा मिला. लेकिन यह बॉक्स काफी क्षतिग्रस्त था और सामान्य तरीके से डेटा नहीं निकाला जा सका. दूसरा ब्लैक बॉक्स 16 जून को विमान के अगले हिस्से से बरामद किया गया. यह कालिख से बुरी तरह सेढका हुआ था, लेकिन उसकी हालत ठीक थी.
भारत में मौजूद लैब क्यों नहीं कर सकी डेटा रिकवरी?
हाल ही में भारत सरकार ने 9 करोड़ रुपए की लागत से एक आधुनिक ब्लैक बॉक्स लैब बनाई है, जिसका उद्घाटन अप्रैल 2025 में हुआ था. यह लैब ब्लैक बॉक्स से डेटा निकालने और उसका विश्लेषण करने के लिए बनाई गई है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद इस लैब में जरूरी संसाधन थे या नहीं. इसलिए डेटा रिकवरी के लिए अमेरिका से किट मंगवानी पड़ी.
ब्लैक बॉक्स में क्या-क्या मिला?
एयर इंडिया के इस बोइंग विमान में दो EAFR ब्लैक बॉक्स थे एक आगे और एक पीछे. इन बॉक्स में उड़ान का डिजिटल डेटा और कॉकपिट की आवाजें रिकॉर्ड होती हैं.
ब्लैक बॉक्स से निकाले गए डेटा में कुल 49 घंटे की उड़ान जानकारी मिली, जिसमें घटना वाले दिन की उड़ान भी शामिल है. 2 घंटे की ऑडियो रिकॉर्डिंग भी मिली है, जिसमें कॉकपिट में हुई पूरी बातचीत रिकॉर्ड है.
रिकॉर्डिंग का प्रारंभिक विश्लेषण हुआ शुरू
ब्लैक बॉक्स से निकाले गए फ्लाइट डेटा और ऑडियो का प्रारंभिक विश्लेषण किया जा चुका है जिससे हादसे की असली वजह जानने में मदद मिलेगी. इससे यह भी समझा जा सकेगा कि हादसे से पहले पायलटों ने क्या-क्या फैसले लिए और किस स्थिति का सामना किया.