
एकादशी व्रत हिन्दू धर्म में अत्यंत पवित्र और पुण्यदायक माना जाता है। वर्ष 2025 में अजा एकादशी का व्रत विशेष महत्व रखता है, जो भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन व्रतधारी भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं और उपवास रखकर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करते हैं। लेकिन एकादशी के अगले दिन जब व्रत का पारण (उपवास खोलना) किया जाता है, तो उसमें तुलसी के पत्ते का सेवन विशेष रूप से किया जाता है। आखिर क्यों? इसका उत्तर धार्मिक परंपराओं और आयुर्वेदिक मान्यताओं दोनों में छिपा है।
धार्मिक कारण
हिन्दू धर्म में तुलसी को देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है और यह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। स्कंद पुराण और पद्म पुराण जैसे ग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि एकादशी व्रत का फल तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक पारण में तुलसी का सेवन न किया जाए। ऐसा माना जाता है कि तुलसी का सेवन करने से व्रत की पूर्णता होती है और विष्णु भगवान की कृपा प्राप्त होती है। एक और मान्यता के अनुसार, एकादशी तिथि को पापहरणी तिथि कहा जाता है, लेकिन व्रत के समापन में शुद्धता बनाए रखना आवश्यक है। तुलसी की पत्तियाँ पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक हैं, जिससे पारण संस्कार पूर्ण रूप से शुद्ध और फलदायी माना जाता है।
आयुर्वेदिक कारण
आयुर्वेद में तुलसी को 'जड़ी-बूटियों की रानी' कहा गया है। व्रत के दौरान शरीर में वात और पित्त का असंतुलन हो सकता है, जिससे कमजोरी, एसिडिटी या थकावट हो सकती है। तुलसी का सेवन शरीर को डिटॉक्स करता है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है और पाचन क्रिया को नियंत्रित करता है। एकादशी व्रत के दौरान दिनभर उपवास के कारण शरीर में जो भी विषैले तत्व जमा होते हैं, उन्हें तुलसी के तत्व बाहर निकालने में मदद करते हैं। इसलिए पारण में तुलसी सिर्फ धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी मानी जाती है।
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच
अजा एकादशी का व्रत जितना पुण्यदायी है, उतना ही इसका पारण भी महत्वपूर्ण होता है। पारण में तुलसी का सेवन सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और वैज्ञानिक सोच का परिचायक है। इसलिए जब भी एकादशी का व्रत करें, पारण में तुलसी जरूर शामिल करें – इससे व्रत न केवल पूर्ण होता है, बल्कि शरीर और मन दोनों को ऊर्जा प्राप्त होती है।