महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम और एनसीपी के बड़े नेता अजित पवार का बुधवार को बारामती के पास प्लेन क्रैश में निधन हो गया। विमान लैंडिंग के दौरान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें अजित पवार समेत सभी सवार लोगों की जान चली गई। पूरा राज्य शोक में डूबा है। अजित पवार को महाराष्ट्र की सियासत का 'बेताज बादशाह' कहा जाता था। उनकी अचानक मौत ने राजनीति में बड़ा खालीपन छोड़ दिया है।
चाचा शरद पवार की उंगली पकड़कर आए सियासत में
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर में हुआ। उनके पिता फिल्म इंडस्ट्री में काम करते थे। पढ़ाई ज्यादा नहीं हो पाई, क्योंकि पिता का देहांत हो गया। 1982 में चाचा शरद पवार की मदद से राजनीति में एंट्री की। पहले सहकारी चीनी मिल और पुणे सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। 16 साल तक बैंक चलाया। चाचा की छत्रछाया में मजबूत हुए।
बारामती से शुरू हुआ सियासी सफर
1991 में पहली बार बारामती से लोकसभा जीते, लेकिन सीट चाचा शरद पवार को दे दी। फिर 1995 में बारामती विधानसभा से विधायक बने। उसके बाद 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 तक लगातार जीतते रहे। कुल सात बार विधायक और एक बार सांसद रहे। बारामती को अपनी मजबूत गढ़ बनाया। महाराष्ट्र में उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी।
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मंत्री से डिप्टी सीएम तक का लंबा रास्ता
अजित पवार ने कई बड़े विभाग संभाले। कृषि, बिजली, सिंचाई, ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय देखे। 1999 में विलासराव देशमुख सरकार में सिंचाई मंत्री बने। बाद में कई सरकारों में काम किया। सबसे खास बात - वे महाराष्ट्र के सबसे ज्यादा बार डिप्टी सीएम बने। कुल छह बार इस पद पर पहुंचे। 2010 से शुरू होकर 2024 तक ये सफर चला।
2019 का ड्रामा: एक साल में दो बार डिप्टी सीएम
2019 में राजनीति में बड़ा ट्विस्ट आया। नवंबर में देवेंद्र फडणवीस के साथ डिप्टी सीएम बने, लेकिन सरकार गिर गई। फिर उद्धव ठाकरे की महाविकास अघाड़ी में भी डिप्टी सीएम बने। एक ही साल में दो अलग-अलग मुख्यमंत्रियों के साथ उपमुख्यमंत्री बने। ये उनकी राजनीतिक चतुराई दिखाता है। वे हर सरकार में अपनी जगह बना लेते थे।
2022 में बगावत: चाचा से अलग होकर नई राह
शरद पवार ने बेटी सुप्रिया सुले को वारिस बनाना चाहा, तो अजित पवार ने 2022 में बगावत कर दी। एनसीपी के कई नेताओं को लेकर बीजेपी के साथ महायुति सरकार में शामिल हुए। 2023 में एनसीपी पर पूरा कब्जा कर लिया। 2024 में फिर डिप्टी सीएम बने। चाचा की छाया से निकलकर खुद को महाराष्ट्र का सबसे ताकतवर नेता साबित किया। उनकी मौत ने सियासत को बड़ा झटका दिया है।