Alarm bells ring for Aravalli: भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली को लेकर राजस्थान में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा तय किए जाने के बाद विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में गहरी चिंता है। आशंका जताई जा रही है कि इस नए मानक के लागू होने से अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएगा। इसी मुद्दे पर राजस्थान की राजनीति भी गरमा गई है। निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी इस मुद्दे को लेकर मुखर नजर आ रहे हैं।
नई परिभाषा, खनन का खतरा
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, केवल वही पहाड़ी अरावली मानी जाएगी जिसकी ऊंचाई आसपास की जमीन से कम से कम 100 मीटर हो और 500 मीटर के दायरे में ऐसी दो या उससे अधिक पहाड़ियां मौजूद हों। विशेषज्ञों का कहना है कि यह परिभाषा अरावली की वास्तविक भौगोलिक संरचना से मेल नहीं खाती। राजस्थान में मौजूद 12 हजार से ज्यादा अरावली पहाड़ियों में से केवल करीब एक हजार ही इस मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा मतलब है कि लगभग 90 फीसदी पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो सकती हैं, जिससे अवैध खनन और निर्माण गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
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पर्यावरणीय असर, राजनीतिक घमासान
विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इस आदेश को खनन माफियाओं के लिए “रेड कार्पेट” बताया है। उनका कहना है कि अरावली कमजोर हुई तो उत्तर-पश्चिम भारत को गंभीर पर्यावरणीय संकट का सामना करना पड़ेगा। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि इससे रियल एस्टेट परियोजनाएं, होटल और फार्महाउस तेजी से बढ़ेंगे, जिससे मरुस्थलीकरण और जल संकट गहराएगा। अरावली राजस्थान की जलवायु संतुलन, मानसून की दिशा और धूल भरी आंधियों को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। यही वजह है कि इस मुद्दे पर अब इसे जन आंदोलन बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं।