इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निकाह हलाला से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए प्राथमिकी रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला POCSO कानून सर्वोच्च प्राथमिकता रखता है और नाबालिगों से जुड़े मामलों में किसी भी पर्सनल लॉ को कानूनी सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
निकाह हलाला से जुड़े मामले पर सुनवाई
मामला उस प्राथमिकी से जुड़ा है जिसमें आरोप लगाया गया था कि निकाह हलाला की प्रक्रिया के दौरान एक महिला के साथ अलग-अलग समय में गंभीर अपराध हुए। शिकायत में कई लोगों के खिलाफ विभिन्न कानूनी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। अदालत के सामने एफआईआर को रद्द करने की मांग रखी गई थी।
अदालत ने POCSO कानून को बताया प्राथमिक
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी नाबालिग से जुड़े यौन अपराध का मामला सामने आता है तो ऐसे मामलों में POCSO कानून लागू होगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए कानूनों को किसी धार्मिक या व्यक्तिगत कानून के आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता की ओर से रखे गए तर्क
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि उस समय लागू प्रावधानों और धार्मिक परंपराओं के आधार पर निकाह हलाला को वैध प्रक्रिया माना जाता था। साथ ही यह भी कहा गया कि संबंधित विवाह व्यवस्था को व्यक्तिगत कानूनों के दायरे में देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हुआ उल्लेख
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि 18 वर्ष से कम आयु की लड़की से जुड़े मामलों में बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया गया है। इसी आधार पर प्राथमिकी को रद्द करने की मांग स्वीकार नहीं की गई।