दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका अब 100 अरब डॉलर मार्केट कैप वाली कंपनियों के मामले में सबसे आगे खड़ा है। अमेरिका की 115 कंपनियां इस खास क्लब में शामिल हैं। खास बात यह है कि 2020 के दौरान यह संख्या सिर्फ 42 थी, जबकि 2008 के वित्तीय संकट के समय यह आंकड़ा घटकर केवल 8 तक पहुंच गया था। पिछले करीब 18 वर्षों में अमेरिकी कंपनियों ने जबरदस्त छलांग लगाई है।
टेक कंपनियों ने बदली तस्वीर
अमेरिका की ताकत के पीछे सबसे बड़ा कारण तकनीकी कंपनियों का तेजी से बढ़ना माना जा रहा है। 100 अरब डॉलर क्लब में सबसे ज्यादा 31 कंपनियां टेक सेक्टर से जुड़ी हैं। इसके बाद वित्तीय क्षेत्र की 19 कंपनियां और इंडस्ट्रियल व हेल्थ सेक्टर की 16-16 कंपनियां शामिल हैं। तकनीक आधारित कंपनियों ने अमेरिकी बाजार को नई ऊंचाई पर पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां
दुनिया की सबसे वैल्यूएबल कंपनियों की सूची में भी अमेरिका का दबदबा साफ दिखाई देता है। एनवीडिया सबसे ऊपर बनी हुई है। इसके बाद अल्फाबेट, ऐपल, माइक्रोसॉफ्ट और ऐमजॉन जैसी कंपनियां शामिल हैं। दुनिया की शीर्ष 10 कंपनियों में से 8 अमेरिका की हैं। बाकी दो कंपनियों में ताइवान की चिप निर्माता कंपनी और सऊदी अरब की ऊर्जा कंपनी शामिल हैं।
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चीन ने भी दिखाई ताकत
हालांकि अमेरिका के बाद चीन भी बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में मौजूद है। दुनिया की शीर्ष 100 कंपनियों की सूची में चीन की 11 कंपनियां शामिल हैं। चीन लगातार तकनीक, विनिर्माण और डिजिटल क्षेत्र में निवेश बढ़ा रहा है। इसी वजह से आने वाले समय में अमेरिका और चीन के बीच यह प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
भारत की स्थिति क्या है
भारत अभी इस मुकाबले में पीछे नजर आता है। दुनिया की शीर्ष 100 वैल्यूएबल कंपनियों में भारत की सिर्फ एक कंपनी ने जगह बनाई है। रिलायंस इंडस्ट्रीज करीब 188 अरब डॉलर मार्केट कैप के साथ सूची में शामिल है। हालांकि 100 अरब डॉलर क्लब में एचडीएफसी बैंक और भारती एयरटेल जैसी कंपनियां भी मौजूद हैं, जिससे संकेत मिलता है कि भारतीय बाजार भी धीरे-धीरे मजबूत हो रहा है।
आगे की चुनौती बड़ी
भारत के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ज्यादा वैश्विक कंपनियां तैयार करने की है। तकनीक, उत्पादन और नवाचार के क्षेत्र में तेज निवेश भारत को आगे बढ़ा सकता है। आने वाले वर्षों में यह मुकाबला सिर्फ कंपनियों का नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक ताकत का भी माना जा रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि भारत और चीन अमेरिका की बढ़त को कितनी चुनौती दे पाते हैं।