अमेरिका ने समुद्र में फंसे रूसी तेल पर पाबंदियों से दी गई छूट को 17 जून 2026 तक बढ़ा दिया है। 17 अप्रैल या उससे पहले लोड हुए रूसी तेल को खरीदने/ट्रांसपोर्ट करने की छूट अब 17 जून 2026 तक रहेगी।
यह छूट 5 मार्च से 11 अप्रैल तक की थी। इसका मकसद अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा -"वैश्विक कच्चे तेल का बाजार स्थिर रखना और तेल उन देशों तक पहुंचाना। इन्हें सबसे ज्यादा जरूरत है"। साथ ही चीन को सस्ता रूसी तेल जमा करने से रोकना भी मकसद है।ईरान-इजरायल युद्ध से होर्मुज स्ट्रेट में 20% तेल सप्लाई रुकी थी, इससे कीमतें $90/बैरल पहुंच गई थीं।
भारत को कितना फायदा?
CLSA की रिपोर्ट के मुताबिक रूस से सस्ता तेल खरीदने से भारत को सालाना सिर्फ 2.5 अरब डॉलर का फायदा हो रहा है। ये भारत की GDP का सिर्फ 0.06% है। पहले 10-25 अरब डॉलर के अनुमान थे, जो गलत निकले।
2022 से रूस भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर है। डिस्काउंट वाले रूसी तेल से भारतीय रिफाइनरियों को वैश्विक ऊर्जा लागत संभालने में मदद मिलती है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। पेट्रोलियम मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा-"छूट हो या न हो, हम रूस से तेल खरीदते रहेंगे। हमारे लिए व्यावसायिक समझ और पर्याप्त सप्लाई सबसे अहम है"। भारत ने लंबी अवधि के समझौते कर रखे हैं।
कीमतों पर कंट्रोल
अगर छूट न मिलती तो जहाजों पर फंसा रूसी तेल नहीं आता और कीमतें और बढ़तीं। भारत का साफ स्टैंडभारत ने अमेरिका को पहले ही बता दिया था: "छूट मिले या न मिले, हम पहले भी खरीदते थे, अब भी खरीदेंगे"। सुजाता शर्मा बोलीं-"छूट से पहले भी, छूट के दौरान भी और अब भी खरीदते रहेंगे"।