Amit Shah UCC : केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में कहा कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए शासित सभी 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता यानी UCC लागू कर दी जाएगी। उनका बयान ऐसे समय आया है जब उत्तराखंड में UCC लागू हो चुका है, जबकि गुजरात, असम और मध्य प्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ चुके हैं। हालांकि, पूरे देश में एक साथ UCC लागू करने के रास्ते में संवैधानिक और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौतियां हैं।
अनुच्छेद 44 में क्या प्रावधान है
समान नागरिक संहिता का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 44 में मिलता है। इसमें राज्य को पूरे देश में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता हासिल करने का प्रयास करने की बात कही गई है। हालांकि, यह राज्य के नीति निदेशक तत्वों का हिस्सा है और अनुच्छेद 37 के तहत इसे अदालत के जरिए सीधे लागू नहीं कराया जा सकता। शादी, तलाक, गोद लेने, भरण-पोषण और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए इन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।
राज्य स्तर पर आगे बढ़ रही BJP
राष्ट्रीय स्तर पर कानून बनाने के बजाय भाजपा अब राज्य-दर-राज्य UCC लागू करने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। उत्तराखंड ने फरवरी 2024 में UCC कानून पास किया और जनवरी 2025 से इसे लागू कर दिया। गुजरात ने मार्च 2026 में UCC विधेयक पास किया। असम ने मई 2026 में ऐसा करने वाला पहला पूर्वोत्तर राज्य बनने का दावा किया, जबकि मध्य प्रदेश ने जुलाई 2026 में UCC लागू किया। हालांकि, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में अंतिम कानूनी प्रक्रिया के अलग-अलग चरण बाकी बताए गए हैं।
जनजातीय क्षेत्रों को क्यों रखा बाहर
UCC को लेकर सबसे अहम सवाल जनजातीय समुदायों और अनुसूचित क्षेत्रों को लेकर है। असम में अनुसूचित जनजातियों को UCC के दायरे से बाहर रखा गया है। छठी और पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में भी विशेष संवैधानिक प्रावधान लागू हैं। इसकी प्रमुख वजह जनजातीय समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षण देना बताई जाती है। इसी वजह से पूरे देश में एक जैसे नागरिक कानून लागू करने की प्रक्रिया में अलग-अलग अपवाद सामने आ रहे हैं।
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विरोध की वजह भी बनी चर्चा
UCC को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध भी जारी है। जनता दल (यूनाइटेड) जैसे एनडीए सहयोगी दलों के नेताओं ने राष्ट्रीय स्तर पर UCC का विरोध किया है। मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है, जबकि भाजपा इसे समानता और विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों से जोड़ती रही है। विपक्ष का आरोप है कि UCC को राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
2029 के लक्ष्य में बड़ी चुनौतियां
अमित शाह के 2029 से पहले 21 राज्यों में UCC लागू करने के लक्ष्य के सामने कई चुनौतियां हैं। अलग-अलग राज्यों में कानूनों के प्रावधान अलग होने पर देश में समान नागरिक कानून की अवधारणा पर सवाल उठ सकते हैं। वहीं गठबंधन सहयोगियों की असहमति राष्ट्रीय कानून की राह मुश्किल बनाती है। इसके अलावा धार्मिक स्वतंत्रता, जनजातीय अधिकार और महिलाओं की समानता जैसे मुद्दों के बीच संतुलन बनाना भी चुनौती रहेगा। ऐसे में 2029 तक UCC का विस्तार कितना हो पाएगा, इस पर राजनीतिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर नजर रहेगी।