
धार्मिक मंच से आमतौर पर लोगों को शांति, सद्भाव और संस्कार की उम्मीद होती है. लेकिन हाल ही में कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने एक ऐसा बयान दिया जिसने न सिर्फ महिलाओं का अपमान किया, बल्कि लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया कि धर्म का मंच आखिर किस दिशा में जा रहा है. क्या उन्हें ये नहीं समझना चाहिए कि अगर नारी नहीं, तो नारायण भी नहीं... यह बात अब सिर्फ कहने की नहीं, समझने की भी है.
क्या कहा कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने?
एक कथा के दौरान एक युवक ने उनसे शादी को लेकर अपनी चिंता जाहिर की. इसके जवाब में अनिरुद्धाचार्य ने कहा, "25 साल की लड़की चार जगह मुंह मार चुकी होती है." उनका यह बयान तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और लोगों ने इसे महिलाओं के सम्मान पर हमला बताया. इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर संसद तक लोगों ने गुस्सा जताया. एक तरफ लोग महिलाओं के सम्मान की बात कर रहे थे, तो दूसरी ओर कुछ लोग धार्मिक आस्था के नाम पर कथावाचक का बचाव कर रहे थे.
खुशबू पाटनी ने दिया करारा जवाब
पूर्व आर्मी अफसर और एक्ट्रेस दिशा पाटनी की बहन खुशबू पाटनी ने इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा, “अगर ये बाबा मेरे सामने होता तो बताती मुंह मारना क्या होता है.” उन्होंने ऐसे कथावाचकों को “राष्ट्रविरोधी” बताया और सवाल किया कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में सिर्फ लड़कियां होती हैं? लड़कों की कोई जिम्मेदारी नहीं?
माफी या घमंड?
जब विवाद बढ़ा तो अनिरुद्धाचार्य ने सफाई दी, लेकिन उनका अंदाज़ माफी से ज्यादा घमंड भरा था. उन्होंने कहा कि उनकी बात को तोड़ा-मरोड़ा गया है और वो कुछ लड़कियों की बात कर रहे थे, सभी की नहीं. लेकिन सवाल ये है कि क्या इस तरह के शब्द किसी भी महिला के लिए सही हैं? क्या एक धार्मिक मंच से ऐसे अपमानजनक शब्दों की अनुमति होनी चाहिए?
महिला आयोग की तीखी प्रतिक्रिया
उत्तर प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष बविता चौहान ने बयान की निंदा करते हुए कहा कि या तो बाबा में समझ नहीं है या फिर उन्हें शोहरत ने घमंडी बना दिया है. उन्होंने साफ कहा कि मंच से इस तरह की भाषा बर्दाश्त नहीं की जा सकती और इस पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए. अब सवाल उठता है कि धर्म का मंच अपमान का स्थान क्यों बनता जा रहा है?
लोगों में यह सवाल गहराता जा रहा है कि अगर धर्म के मंच से महिलाओं को ही बार-बार निशाना बनाया जाएगा, तो क्या ऐसे मंचों को समर्थन देना सही है? क्या अब व्यासपीठ से संस्कार नहीं, बल्कि महिलाओं के लिए अपशब्द सुनने को मिलेंगे? अब वक्त है सोचने का. हमें धर्म की रक्षा करनी है या उन लोगों की जो इसके नाम पर नफरत और अपमान फैला रहे हैं. यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान और समाज की सोच पर एक गंभीर चोट है.