RSS Chief Mohan Bhagwat: आरएसएस के शताब्दी समारोह के अवसर पर मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने संगठन की कार्यप्रणाली और भविष्य की दिशा को लेकर अहम बातें कहीं। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शीर्ष पद किसी जाति विशेष के लिए आरक्षित नहीं है। जो व्यक्ति काम करने की क्षमता रखता है और जिम्मेदारी निभाने योग्य होता है, वही संघ प्रमुख बनता है, चाहे वह किसी भी सामाजिक वर्ग से क्यों न हो।
सेवा सबसे अहम
मोहन भागवत ने कहा कि संघ में व्यक्ति की पहचान उसके कार्य से होती है, न कि उसकी जाति से। संघ प्रमुख न ब्राह्मण होता है, न क्षत्रिय और न ही वैश्य। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग से आने वाला व्यक्ति भी सरसंघचालक बन सकता है। संघ में आगे बढ़ने का एकमात्र आधार सेवा, समर्पण और कार्यक्षमता है।
समाज सेवा जारी रहेगी
अपने संबोधन में उन्होंने उम्र और जिम्मेदारी का भी जिक्र किया। भागवत ने कहा कि नियम के अनुसार 75 वर्ष की आयु के बाद दायित्व छोड़ने की परंपरा है। उन्होंने खुद निवृत्ति की इच्छा जताई थी, लेकिन सहयोगियों के आग्रह पर जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। हालांकि उन्होंने साफ किया कि पद से हटने के बाद भी समाज के लिए काम आखिरी सांस तक जारी रहेगा।
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मुस्लिम समाज
संघ प्रमुख ने कहा कि मुस्लिम समाज भी देश का अभिन्न हिस्सा है और स्वयंसेवक उनके बीच जाकर सामाजिक कार्य कर रहे हैं। धर्म परिवर्तन पर उन्होंने कहा कि आस्था व्यक्ति की निजी पसंद है, लेकिन जबरदस्ती या लालच से किया गया कन्वर्जन स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने 2047 तक अखंड भारत की कल्पना करते हुए कहा कि देश को तोड़ने वाले विचार खुद कमजोर पड़ जाएंगे।
रोजगार, तकनीक और सामाजिक समरसता पर जोर
मोहन भागवत ने जातिगत भेदभाव खत्म करने, संवैधानिक आरक्षण के समर्थन और समाज के कमजोर वर्गों को ऊपर उठाने की बात कही। उन्होंने युवाओं को सिर्फ ऊंची सैलरी वाली नौकरियों के पीछे न भागने की सलाह दी और तकनीक व एआई को अपनाते हुए रोजगार सृजन पर जोर दिया। साथ ही, हाथ से काम करने वालों के सम्मान और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने को जरूरी बताया।