Arctic Shipping Route Northern Sea Route ---होर्मुज और लाल सागर जैसे समुद्री संकटों के बीच दुनिया के सामने कारोबार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए नए रास्तों की तलाश तेज हो गई है। इसी कड़ी में आर्कटिक का नॉर्दर्न सी रूट अब भारत, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के लिए अहम होता जा रहा है। गर्मियों के महीनों में बर्फ की स्थिति अपेक्षाकृत अनुकूल होने से इस रास्ते पर जहाजों की आवाजाही संभव हो रही है। भारत भी 2027 में इस रूट से अपना पहला पायलट कार्गो जहाज भेजने की तैयारी कर रहा है।
आर्कटिक रूट पर क्यों बढ़ी दिलचस्पी?
आर्कटिक क्षेत्र में तापमान बढ़ने के साथ गर्मियों के दौरान समुद्री बर्फ की स्थिति में बदलाव आया है। जुलाई से अक्टूबर के बीच इस इलाके में शिपिंग के लिए रास्ता अपेक्षाकृत खुला रहता है। दूसरी तरफ होर्मुज और लाल सागर के संकट के चलते पारंपरिक समुद्री मार्गों पर समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं। ऐसे में नॉर्दर्न सी रूट एशिया और यूरोप के बीच वैकल्पिक कनेक्शन के तौर पर देखा जा रहा है।
चीन ने शुरू की नियमित कंटेनर सेवा
इस रूट पर चीन ने अपनी मौजूदगी तेजी से बढ़ाई है। चीनी शिपिंग कंपनी ‘सी लीजेंड’ ने आर्कटिक के रास्ते नियमित साप्ताहिक कंटेनर सेवा शुरू की है। इसे चीन के लंबे समय से चले आ रहे ‘पोलर सिल्क रोड’ विजन से जोड़कर देखा जा रहा है। इस रूट से चीन को यूरोप के साथ व्यापार के लिए एक वैकल्पिक समुद्री रास्ता मिल सकता है और दूसरे समुद्री चोकपॉइंट्स पर निर्भरता भी कम करने में मदद मिल सकती है।
भारत का 2027 में पहला पायलट जहाज
भारत भी नॉर्दर्न सी रूट की संभावनाओं को लेकर सक्रिय है। शिपिंग मंत्रालय के संयुक्त सचिव एस. वेंकटेशपति ने 13 अगस्त को रूस के अर्खांगेल्स्क में आयोजित आर्कटिक-रीजन फोरम में कहा था कि भारत 2027 में इस रास्ते से पहला पायलट जहाज चलाने की योजना बना रहा है। इस रूट में भारत की दिलचस्पी केवल लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं मानी जा रही। इससे रूस के तेल, गैस और खनिज संसाधनों तक पहुंच के लिए नया विकल्प भी तैयार हो सकता है।
यात्रा का समय और दूरी घटने की उम्मीद
नॉर्दर्न सी रूट का सबसे बड़ा आकर्षण इसकी दूरी और समय को लेकर है। उपलब्ध आकलन के मुताबिक, एशिया और उत्तरी यूरोप के बीच इस रास्ते से यात्रा स्वेज नहर वाले मार्ग की तुलना में करीब दो सप्ताह तक कम हो सकती है। शिपिंग दूरी में लगभग 40 प्रतिशत तक कमी आने की संभावना भी जताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर इस रूट का इस्तेमाल नियमित तौर पर बढ़ता है तो रूस के ऊर्जा संसाधनों को एशियाई बाजारों तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है। हालांकि आर्कटिक की कठोर परिस्थितियां, बर्फ और मौसम अब भी बड़ी चुनौती हैं।