गणेशोत्सव का पर्व पूरे देश में भक्ति और उल्लास से मनाया जा रहा है। इसी कड़ी में ग्वालियर का 350 साल पुराना ‘अर्जी वाले गणेश’ मंदिर श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां हर वर्ष गणेश चतुर्थी से 11 दिन तक भव्य आयोजन होते हैं। मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे मन से अर्जी लगाने पर भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। यही वजह है कि यहां दूर-दूर से हजारों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं।
इतिहास और मान्यता
ग्वालियर के इस मंदिर का इतिहास काफी रोचक है। कहा जाता है कि पहले लोग सड़क किनारे रखे एक विशाल पत्थर की पूजा करते थे। वर्ष 1980 में वह पत्थर अचानक चमत्कारी रूप से अपना आवरण छोड़ बैठा और वहां भगवान गणेश की दिव्य प्रतिमा प्रकट हुई। प्रतिमा के दोनों ओर रिद्धि और सिद्धि विराजमान हैं। यह प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है, जिसमें भगवान गणेश के हाथों में विद्या और फरसा है तथा नीचे दो मूषक अंकित हैं।
अर्जी वाले गणेश का चमत्कार
मंदिर की सबसे बड़ी मान्यता अर्जी लगाने से जुड़ी है। श्रद्धालु मानते हैं कि यदि कोई भक्त लगातार 7 या 11 बुधवार तक यहां सच्चे मन से प्रार्थना करता है, तो उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। इसी वजह से इन्हें ‘अर्जी वाले गणेश’ कहा जाता है। यहां बुधवार के दिन इतनी भीड़ होती है कि मंदिर परिसर और आसपास की सड़कें श्रद्धालुओं से भर जाती हैं।
विशेष भोग और आयोजन
इस मंदिर की खासियत यह भी है कि भगवान गणेश को केवल राजस्थान से लाए गए मोटी बूंदी के लड्डुओं का ही भोग लगाया जाता है। गणेश चतुर्थी से शुरू होकर 11 दिनों तक मंदिर परिसर रोशनी, भजन-कीर्तन और भक्तों के जयकारों से गूंजता रहता है। विवाहित और अविवाहित दोनों ही लोग यहां अर्जी लगाते हैं—जहां विवाह योग्य युवक-युवतियों की शादी जल्दी तय होने की मान्यता है, वहीं विवाहित लोग अपने पारिवारिक जीवन की समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए यहां आते हैं।
आस्था का अद्भुत केंद्र
ग्वालियर का यह प्राचीन मंदिर सिर्फ शहर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश की आस्था का प्रतीक बन चुका है। भक्तों का विश्वास है कि यहां की गई हर अर्जी भगवान गणेश अवश्य पूरी करते हैं। यही वजह है कि इसे सिद्धि योग गणेश का मंदिर भी कहा जाता है।