पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब एशियाई देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर साफ दिखाई देने लगा है। बढ़ती तेल कीमतों और सप्लाई संकट के बीच भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका ने बड़ा फैसला लेते हुए सरकारी दफ्तरों में चार दिन का वर्क वीक लागू कर दिया है। अब वहां हर बुधवार छुट्टी रहेगी, यानी हफ्ते में सिर्फ चार दिन काम होगा। यह कदम ईंधन की संभावित कमी और बढ़ती लागत को देखते हुए उठाया गया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़
इस संकट की सबसे बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में आई रुकावट है, जो वैश्विक ऊर्जा सप्लाई का प्रमुख मार्ग है। यहां तनाव बढ़ने से तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई है। एशियाई देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, ऐसे में सप्लाई में थोड़ी भी बाधा सीधे उनकी अर्थव्यवस्था पर असर डालती है। पिछले साल इस मार्ग से गुजरने वाले करीब 90 प्रतिशत तेल और गैस की खपत एशिया में ही हुई थी।
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एशियाई देशों ने उठाए सख्त कदम
ईंधन संकट से निपटने के लिए कई देशों ने अलग-अलग उपाय शुरू कर दिए हैं। थाईलैंड में लोगों को एसी कम चलाने की सलाह दी जा रही है, जबकि म्यांमार में वाहनों पर ऑड-ईवन नियम लागू किया गया है। बांग्लादेश ने ऊर्जा बचाने के लिए छुट्टियां बढ़ा दी हैं और बिजली कटौती का शेड्यूल लागू किया है। फिलीपींस में सरकारी कर्मचारियों के लिए वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य किया गया है, वहीं वियतनाम ने लोगों से सार्वजनिक परिवहन और साइकिल के इस्तेमाल की अपील की है।
श्रीलंका में ईंधन राशनिंग फिर लागू
श्रीलंका ने ‘नेशनल फ्यूल पास’ सिस्टम को फिर से लागू कर दिया है, जिसके तहत निजी वाहनों के लिए ईंधन की सीमा तय कर दी गई है। कारों के लिए 15 लीटर और मोटरसाइकिलों के लिए 5 लीटर तक की सीमा निर्धारित की गई है। यह कदम 2022 के आर्थिक संकट की याद दिलाता है, जब इसी तरह की पाबंदियां लगाई गई थीं। हालांकि आम लोगों ने इस सीमा को अपर्याप्त बताया है।
भारत पर भी दिखने लगा असर
इस वैश्विक संकट की आंच भारत तक भी पहुंच चुकी है। देश के कई हिस्सों में एलपीजी की कमी महसूस की जा रही है। सरकार ने इससे निपटने के लिए गैस बुकिंग की तारीखों में बदलाव किया है और कमर्शियल उपभोक्ताओं को पीएनजी की ओर शिफ्ट होने की सलाह दी है। बढ़ती अनिश्चितता के बीच साफ है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो एशिया के कई और देशों को भी कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।