कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में 31 जुलाई भारतीय जूडो के लिए ऐतिहासिक दिन बन गया। त्रिपुरा के बेलोनिया की रहने वाली अस्मिता डे ने महिलाओं की 48 किलोग्राम स्पर्धा के फाइनल में कनाडा की हाइडी क्वाक को गोल्डन स्कोर में हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके साथ ही उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में जूडो में भारत की पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता बनने का गौरव हासिल किया।
एथलेटिक्स से शुरू हुआ सफर
अस्मिता ने अपने खेल करियर की शुरुआत जूडो से नहीं, बल्कि 800 मीटर दौड़ से की थी। वर्ष 2015 में त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल में दाखिले के बाद उन्होंने एथलेटिक्स में कदम रखा। बाद में कोच की सलाह पर उन्होंने जूडो को चुना। बेलोनिया विद्यापीठ कोचिंग सेंटर की बीना देबनाथ और त्रिपुरा स्पोर्ट्स स्कूल के कोच माणिक लाल देब ने उनकी शुरुआती ट्रेनिंग में अहम भूमिका निभाई।
आर्थिक तंगी के बावजूद नहीं टूटी हिम्मत
अस्मिता का परिवार बेहद साधारण है। उनके पिता बेलोनिया में साइकिल मरम्मत की छोटी दुकान चलाते थे। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि 2023 में ताशकंद ग्रैंड स्लैम में हिस्सा लेने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। राज्य सरकार से मदद की अपील के बावजूद फंड नहीं मिल सका और उन्हें प्रतियोगिता छोड़नी पड़ी। लेकिन इन मुश्किलों के बावजूद उन्होंने अपने सपनों से समझौता नहीं किया।
पिता के निधन के बाद भी जारी रखा संघर्ष
दिसंबर 2025 में अस्मिता के पिता का निधन हो गया। यह उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। सिर्फ दो महीने बाद एशियन गेम्स ट्रायल्स में राष्ट्रीय स्तर पर पहला स्थान हासिल कर दमदार वापसी की। कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद उन्होंने यह पदक अपने दिवंगत पिता और अपने कोच को समर्पित किया।
पहले भी जीत चुकी हैं कई बड़े मेडल
अस्मिता डे पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नाम रोशन कर चुकी हैं। उन्होंने 2022 एशियन कैडेट एवं जूनियर जूडो चैंपियनशिप में कांस्य पदक, 2023 कुवैत एशियन ओपन में रजत पदक, जूनियर एशियन कप में स्वर्ण पदक और 2025 कासाब्लांका अफ्रीकन ओपन में भी स्वर्ण पदक जीता था। फिलहाल वह भोपाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) केंद्र में कोच यशपाल सोलंकी के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण ले रही हैं।
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संघर्ष से सफलता तक की मिसाल
बेलोनिया के छोटे से कस्बे से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स के शीर्ष पोडियम तक पहुंचने वाली अस्मिता डे आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। सीमित संसाधन, आर्थिक कठिनाइयों और व्यक्तिगत दुखों के बावजूद उन्होंने साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती। उनका यह ऐतिहासिक स्वर्ण पदक भारतीय जूडो के लिए नए युग की शुरुआत माना जा रहा है।