असम की राजनीति में सोमवार को उस वक्त बड़ा सियासी ड्रामा देखने को मिला जब असम कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने पार्टी से इस्तीफा देने का ऐलान कर दिया, लेकिन महज कुछ घंटों बाद ही अपना फैसला वापस भी ले लिया। आत्मसम्मान और नजरअंदाजी का मुद्दा उठाने वाले बोरा के यू-टर्न ने चुनावी साल में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आत्मसम्मान बनाम संगठन: इस्तीफे की वजह क्या थी?
भूपेन बोरा ने सुबह करीब 8 बजे पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को अपना इस्तीफा भेजा था। उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी हाईकमान संगठन से जुड़े अहम मुद्दों पर समय रहते फैसले नहीं ले रहा और उनकी बातों को नजरअंदाज किया जा रहा है। बोरा ने साफ कहा था कि यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रही नाराजगी का परिणाम है। उनका कहना था कि कई बार चिंता जताने के बावजूद कोई ठोस प्रतिक्रिया नहीं मिली।
चुनावी साल में बढ़ी हलचल
असम में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में एक वरिष्ठ नेता का इस्तीफा देना पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा था। इस्तीफे की खबर के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई। कई वरिष्ठ नेता उनके गुवाहाटी स्थित आवास पहुंचे और लंबी बातचीत का दौर चला। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत संवाद की पहल की।
हाईकमान की सक्रियता और राहुल गांधी की बातचीत
सूत्रों के मुताबिक, इस्तीफा मिलने के बाद पार्टी नेतृत्व सक्रिय हुआ। राहुल गांधी समेत शीर्ष नेताओं ने बोरा से बातचीत की। असम प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह ने कहा कि मतभेद परिवार का हिस्सा होते हैं और संवाद के जरिए समाधान निकाला गया। पार्टी अध्यक्ष ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। बताया गया कि करीब 30 साल से पार्टी से जुड़े बोरा को मनाने के लिए विशेष प्रयास किए गए।
बीजेपी का ऑफर और बढ़ती अटकलें
इस्तीफे के तुरंत बाद असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि बोरा के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि बोरा भाजपा में आते हैं तो उन्हें सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ाने की कोशिश की जाएगी। हालांकि मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि बोरा की ओर से कोई औपचारिक संपर्क नहीं हुआ है। इस बयान के बाद राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई थीं।
यू-टर्न के पीछे क्या संकेत?
कुछ ही घंटों में इस्तीफा वापस लेने से साफ है कि पार्टी नेतृत्व ने असंतोष को गंभीरता से लिया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी साल में बड़े चेहरे को खोना कांग्रेस के लिए नुकसानदेह होता। वहीं बोरा के लिए भी पार्टी छोड़ना बड़ा जोखिम हो सकता था। फिलहाल यह घटनाक्रम असम कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक मजबूती और नेतृत्व की भूमिका पर नई बहस छेड़ गया है।