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Entertainment News. : हिंदी सिनेमा का एक चमकता सितारा, जिसने पांच दशकों से भी अधिक समय तक अपने अद्भुत अभिनय और बेजोड़ हास्य से दर्शकों का दिल जीता, वह थे गोवर्धन असरानी — जिन्हें हम सभी प्यार से "असरानी" के नाम से जानते हैं। 20 अक्टूबर 2025 को उनके निधन की खबर ने पूरे फिल्म जगत को शोक में डाल दिया। उन्होंने न सिर्फ सैकड़ों फिल्मों में अपने किरदारों से हँसी और इंसानियत की झलक दिखाई, बल्कि अपने जीवन से यह भी सिखाया कि सच्चा कलाकार वही है जो हर परिस्थिति में खुद को निखारता है और अपने काम से पहचान बनाता है.
असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर, राजस्थान में एक साधारण सिंधी परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अभिनय में रुचि थी और उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) से अभिनय की पढ़ाई की। शुरुआती दौर में संघर्ष तो ज़रूर रहा, लेकिन उनकी प्रतिभा और मेहनत ने जल्द ही उन्हें फिल्मों में जगह दिलाई। 1960 के दशक के अंत से लेकर 1980 के दशक तक वह हर निर्माता-निर्देशक की पहली पसंद बन गए, खासकर कॉमिक किरदारों के लिए.
उनका सबसे यादगार किरदार शायद 1975 की फिल्म शोले में जेलर का रहा, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश दौर के एक बेहद नाटकीय लेकिन मज़ेदार जेलर का रोल निभाया। उनका डायलॉग — “हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं” आज भी लोगों के चेहरों पर मुस्कान ले आता है। असरानी ने लगभग 350 से अधिक फिल्मों में काम किया और हर पीढ़ी के दर्शकों को अपनी कला से प्रभावित किया. लेकिन असरानी सिर्फ एक हास्य कलाकार नहीं थे। उन्होंने गंभीर भूमिकाएँ भी निभाईं और निर्देशन में भी हाथ आज़माया। 1977 में आई फिल्म चला मुरारी हीरो बनने न सिर्फ उन्होंने निर्देशित की, बल्कि इसकी कहानी भी लिखी और उसमें अभिनय भी किया। यह फिल्म उनकी अपनी जीवन-यात्रा से प्रेरित थी.
अपने व्यक्तिगत जीवन में भी असरानी एक शांत, सादगी पसंद और विनम्र व्यक्ति रहे। उन्होंने अभिनेत्री मंजू असरानी से विवाह किया, लेकिन दोनों ने फ़िल्मी चकाचौंध से दूर सादा जीवन चुना। वे हमेशा अभिनय को सेवा और साधना मानते रहे, न कि केवल प्रसिद्धि पाने का माध्यम. 84 वर्ष की आयु में, लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हुआ, लेकिन उन्होंने जिस ऊँचाई को छुआ, वह विरले ही किसी अभिनेता को नसीब होती है। वे चले गए, लेकिन उनके निभाए किरदार, संवाद, हाव-भाव और अंदाज़ हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे.
असरानी एक नाम नहीं, एक एहसास थे — जो हर सिनेप्रेमी के चेहरे पर मुस्कान छोड़ गए
उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता मेहनत, समर्पण और एक सकारात्मक दृष्टिकोण से ही मिलती है। हिंदी सिनेमा में उनका योगदान अमिट है, और उनका नाम हमेशा स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा.