उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। दलित राजनीति की धुरी मानी जाने वाली बसपा और समाजवादी पार्टी के बीच अब एक नया खिलाड़ी अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराने की तैयारी में है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले के नेतृत्व वाली रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) ने यूपी में संगठन विस्तार और बड़े राजनीतिक दावे कर सपा-बसपा की रणनीति पर सीधी चुनौती दे दी है।
यूपी में आरपीआई (आठवले) की सियासी एंट्री
केंद्र सरकार में एनडीए की सहयोगी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) ने उत्तर प्रदेश में सक्रिय राजनीति का बिगुल फूंक दिया है। पार्टी अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने सोमवार को यूपी के पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ अहम बैठक कर संगठन की दिशा और आगामी रणनीति पर चर्चा की। इस बैठक के जरिए साफ संकेत दिया गया कि आरपीआई अब यूपी में केवल सहयोगी की भूमिका में नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र राजनीतिक ताकत के रूप में उभरना चाहती है।
62 जिलों में संगठन, 75 पर नजर
रामदास आठवले ने दावा किया कि प्रदेश के 75 जिलों में से 62 जिलों में पार्टी की कार्यकारिणी गठित हो चुकी है। यह दावा सपा और बसपा दोनों के लिए सियासी दबाव बढ़ाने वाला माना जा रहा है। आठवले के मुताबिक, पार्टी तेजी से जमीनी स्तर पर काम कर रही है और दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक वर्ग के बीच अपनी पैठ मजबूत कर रही है।
लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी
आरपीआई (आठवले) ने 5 अप्रैल 2026 को लखनऊ में एक विशाल रैली का ऐलान किया है। पार्टी का दावा है कि इस रैली में एक लाख से अधिक लोगों के शामिल होने की संभावना है। इसे यूपी में पार्टी की ताकत दिखाने और आगामी चुनावों से पहले बड़ा संदेश देने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।
मायावती और अखिलेश पर तीखा हमला
रामदास आठवले ने बसपा प्रमुख मायावती पर निशाना साधते हुए कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद दलितों, वंचितों और गरीबों के लिए शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में ठोस बदलाव नहीं हुए। वहीं समाजवादी पार्टी के पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे को उन्होंने सिर्फ चुनावी जुमला करार दिया।
पीडीए के मुकाबले डीपीए की राजनीति
आठवले ने साफ किया कि आरपीआई अब डीपीए यानी दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के साथ मिलकर वास्तविक बदलाव की राजनीति करेगी। उनका दावा है कि पार्टी केवल नारे नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर काम कर रही है। उत्तर प्रदेश की कार्यकारी समिति की बैठक में संगठन विस्तार के साथ-साथ सामाजिक मुद्दों पर भी गहन मंथन हुआ।
बदलती सियासी तस्वीर
राजनीतिक जानकारों की मानें तो यदि आरपीआई (आठवले) अपने संगठनात्मक दावों को जमीन पर उतारने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर सपा और बसपा के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। आने वाले समय में यूपी की राजनीति में डीपीए बनाम पीडीए की यह लड़ाई और दिलचस्प होती नजर आ रही है।