
भारत हर रोज तरक्की के नए आयाम गढ़ रहा है. एक-एक करके हर दिन विकास की ओर एक नया कदम उठा रहा है. कमजोर देश से आज महाशक्ति बन कर उभर रहा है भारत, लेकिन ये तरक्की बिल्कुल भी आसान नहीं थी, इसमें कहानी है संकट से घिरे हालातों की, संकल्पों की और सफलताओं की. साल 1965 का भारत आज से बिल्कुल अलग था. हालात बिल्कुल आज के मायने में उलट थे, लेकिन तब और अब जो एक चीज समान है वो है ‘संकल्प’…. जी हां संकल्प नव निर्माण का, नव चेतना का, उम्मीदों से भरी उड़ान का और संकल्प विकास का. संकल्प अपने पैरों पर खड़ा होने का वो भी बिना किसी देश की मदद के.
साल 1965 के हालात
साल 1965 का भारत आज के भारत से बिल्कुल अलग था. आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, विदेशी सहायता पर देश की निर्भरता थी. उस वक्त कृषि उत्पादन लगातार घट रहा था, सूखा और भुखमरी का खतरा देश पर मंडरा रहा था. दूसरी ओर सुरक्षा के मोर्चे की बात करें तो पाकिस्तान ने सीमा पर हमला कर दिया था. उस समय भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर नहीं था. अमेरिका से PL-480 योजना के तहत लाल गेहूं आता था और उसी पर करोड़ों भारतीयों का पेट भरता था लेकिन युद्ध के दौरान अमेरिका ने गेहूं भेजने में आनाकानी की और साफ़ संदेश दिया, "हमारे कहे बिना भारत कुछ नहीं कर सकता."
इसी बीच लाल बहादुर शास्त्री जो अपनी सादगी और दृढ़ निश्चय के लिए जाने जाते थे उन्होंने देश को "जय जवान, जय किसान" का नारा दिया.
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इस नारे में दो बातें छिपी थीं-
1. जवान को सम्मान — जो सीमा पर देश की रक्षा कर रहा है.
2. किसान को प्रेरणा — जो खेत में देश की भूख मिटाने का काम कर रहा है.
शास्त्री जी ने जनता से अपील की थी कि एक दिन का उपवास रखें और अनाज की खपत कम करें. यह सिर्फ आर्थिक फैसला नहीं था, यह राष्ट्रीय आत्मसम्मान की रक्षा का कदम था.
इसके बाद हरित क्रांति की शुरुआत हुई. नई किस्मों के बीजों का प्रयोग हुआ, सिंचाई में सुधार किया गया और खेती में उर्वरकों का इस्तेमाल किया गया. कुछ ही सालों में भारत खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो गया और अमेरिका की शर्तों से मुक्त हुआय.
2025: दुनिया की तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़
आज का भारत आर्थिक और तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा मज़बूत है, लेकिन वैश्विक व्यापार की राजनीति अब भी कठिन है. हाल ही में अमेरिका ने भारत से मांग की है कि मक्का, सोयाबीन, बादाम, डेयरी उत्पाद जैसे अमेरिकी सामानों पर आयात शुल्क घटाया जाए और GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) फसलों को भारतीय बाजार में आने दिया जाए. लेकिन सरकार ने इससे साफ़ मना कर दिया. कारण स्पष्ट था क्योंकि भारत के किसान छोटे पैमाने पर खेती करते हैं जबकि अमेरिकी किसान भारी सब्सिडी और आधुनिक तकनीक से उत्पादन करते हैं, जिससे उनका माल सस्ता पड़ता है. अगर आयात शुल्क घटा, तो भारतीय किसान बाजार में टिक ही नहीं पाएंगे.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से कहा, "किसानों, मछुआरों और पशुपालकों के हितों की रक्षा के लिए मैं एक दीवार की तरह खड़ा हूं."
आत्मनिर्भरता का नया अर्थ
1965 में आत्मनिर्भरता का मतलब था विदेशी गेहूं पर निर्भरता खत्म करना. वहीं अब 2025 में आत्मनिर्भरता का मतलब है अपनी खेती, मछली पालन, डेयरी को विदेशी दबाव से बचाना. स्थानीय उद्योग को मजबूत करना ताकि रोजगार देश के भीतर बने. साथ ही टेक्नोलॉजी में इनोवेशन लाकर विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धी बनना.
प्रधानमंत्री मोदी का जोर है कि वोकल फॉर लोकल के जरिए स्थानीय उत्पादों को अपनाओ और दुनिया तक पहुंचाओ. युवा उद्यमिता के तहत नए स्टार्टअप और उद्योगों को बढ़ावा. पीएम विकसित भारत रोजगार योजना के तहत पहली नौकरी पाने वाले युवाओं को ₹15,000 की मदद मिले.
दो युग, एक सोच
इन दो युगों में दोनों की सोंच एक जैसी रही है. दोनों नेताओं के संदेशों के कुछ अंश इस प्रकार हैं-
लाल बहादुर शास्त्री (1965): "अपने किसान और जवान ही भारत की असली ताकत हैं" खाद्यान्न संकट से निकले और आत्मनिर्भर बने.
नरेंद्र मोदी (2025): "अपने किसान, युवा और उद्योग ही भारत की ताकत हैं." वैश्विक दबाव से लड़ते हुए आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का निर्माण करना है.
दोनों के संदेश अलग दौर के लिए थे, लेकिन जड़ एक ही थीं. अपनी ताकत पर भरोसा करो, अपने लोगों को सशक्त बनाओ और किसी भी दबाव में झुको मत.