अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज का नया फरमान पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है. यहां अब गलती करने पर छात्रों को न डांटा जाएगा, न कठोर सजा दी जाएगी, बल्कि उन्हें अपनी कॉपी में राम-राम लिखना होगा. गलती जितनी बड़ी, लिखने की संख्या उतनी ज्यादा 11 हजार से 51 हजार तक होगी. प्राचार्य डॉ. सत्यजीत वर्मा का मानना है कि शिक्षा का काम सिर्फ डिग्री देना नहीं बल्कि संस्कार और अनुशासन भी सिखाना है, और इसके लिए कठोर दंड नहीं, सकारात्मक तरीका जरूरी है.
‘राम नाम’ लिखने से मिलेगा संयम और शांति
कॉलेज प्रशासन का कहना है कि बार-बार राम नाम लिखने से छात्रों में धैर्य, शांति और आत्मनियंत्रण आता है. कई छात्रों ने इस प्रक्रिया को मानसिक रूप से सुकून देने वाला बताया है. एक टेक्निशियन, जिसे ड्यूटी से गायब होने पर यह ‘दंड’ मिला, अब तक चार पूरी कॉपियां लिख चुका है और कहता है कि इस प्रक्रिया ने उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए हैं. नियम लागू होते ही 4-5 छात्रों ने अपनी कॉपियां जमा भी कर दीं, जिससे ये पहल छात्रों में उत्साह का कारण बन गई है.
जहां गलती, वहीं सुधार, धर्म नहीं, संस्कार का संदेश
प्राचार्य वर्मा ने स्पष्ट किया है कि यह नियम किसी धर्म को थोपने के लिए नहीं है. जो राम को मानते हैं, वे राम-राम लिखें, और जो कृष्ण या किसी अन्य देवी-देवता को मानते हैं, वे उनका नाम लिख सकते हैं. उद्देश्य केवल इतना है कि छात्र गलती से सीखें और मानसिक रूप से संतुलित रहें। इसके लिए कॉलेज ने विशेष राम-नाम कॉपी भी मंगाई है, जिसमें 51 हजार तक जगह रखी गई है ताकि छात्र आसानी से गिनती के साथ नाम लिख सकें.
शिक्षा में संस्कार जोड़ने की प्रेरक पहल
इस अनोखे प्रयोग ने अयोध्या को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है, लेकिन इस बार कारण धार्मिक नहीं, बल्कि शिक्षण पद्धति का नया मॉडल है. छात्र-छात्राएं कह रहे हैं कि यह तरीका डर से मुक्त, लेकिन सीख से भरा हुआ है. शिक्षकों का मानना है कि इससे कॉलेज का माहौल अनुशासित और सौहार्दपूर्ण बनेगा. इस फैसले ने दिखा दिया है कि गलती सुधारने का रास्ता दंड से नहीं, संस्कार से होकर गुजरता है और अयोध्या ने इस दिशा में एक प्रेरणादायक शुरुआत की है.