जिस अयोध्या के कण-कण में राम नाम गूंजता है, वहां आज गहरा सन्नाटा है। राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख संत डॉ. रामविलास वेदांती के निधन की खबर ने पूरे देश में भावनाएं झकझोर दीं। मध्य प्रदेश के रीवा में उनके निधन की सूचना मिलते ही अयोध्या, गोरखपुर और दिल्ली तक शोक की लहर दौड़ गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भावुक दिखे, संत समाज की आंखें नम हो गईं और राम भक्तों को लगा कि आंदोलन का एक मजबूत स्तंभ हमेशा के लिए शांत हो गया।
बाल संत से आंदोलन के अग्रदूत तक
डॉ. रामविलास वेदांती का जीवन साधारण नहीं था। महज 12 साल की उम्र में घर छोड़कर अयोध्या आए वेदांती ने संत जीवन अपनाया, लेकिन उनका तप सिर्फ साधना तक सीमित नहीं रहा। अस्सी के दशक में राम मंदिर आंदोलन के दौरान वे महंत अवैद्यनाथ स्वामी परमहंस के साथ मजबूती से खड़े दिखे। यही वह परंपरा थी जिससे योगी आदित्यनाथ जुड़े। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे नेताओं के साथ वेदांती हर मोर्चे पर सक्रिय रहे और आंदोलन की रीढ़ बने।
वे शब्द जो आज भी गूंजते हैं
1990 और 1992 के दौर में अयोध्या में जुटे साधु-संतों के बीच वेदांती सबसे मुखर आवाज थे। वे गांव-गांव घूमे और राम मंदिर आंदोलन की अलख जगाई। इसी भूमिका के कारण उन्हें राम जन्मभूमि न्यास का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। कई संत आज भी कहते हैं कि जब कारसेवक डगमगाते थे, वेदांती के शब्द उन्हें फिर खड़ा कर देते थे। उनका यह कथन आज भी याद किया जाता है कि जिस दिन रामजन्मभूमि पर केसरिया ध्वज लहराएगा, उसी दिन भारत की आत्मा जागेगी।
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योगी-मोदी से जुड़ा भावनात्मक रिश्ता
संत वेदांती सिर्फ आंदोलन का चेहरा नहीं थे, बल्कि एक विचारधारा का प्रतीक थे। योगी आदित्यनाथ के साथ उनका रिश्ता गुरु परंपरा और भावनात्मक विश्वास से जुड़ा था। वे अक्सर कहते थे कि महंत अवैद्यनाथ ने जाते-जाते राम मंदिर बनने का भरोसा दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को लेकर भी वेदांती के शब्द चर्चा में रहते थे। अयोध्या के संतों का कहना है कि वेदांती ने अपना पूरा जीवन राम कार्य को समर्पित कर दिया। आज भले ही वे शरीर से चले गए हों, लेकिन उनकी सोच और संघर्ष राम भक्तों की आस्था में हमेशा जीवित रहेंगे।