यूपी की राजनीति में अचानक उस वक्त हलचल मच गई, जब महीनों की नाराजगी, अटकलों और चर्चाओं के बीच आजम खान अचानक अखिलेश यादव के लखनऊ आवास पहुंच गए. न कोई घोषणा, न कोई राजनीतिक आहट सिर्फ 30 मिनट की बंद कमरे की बातचीत और बाहर आते ही सियासत में भूचाल मच गया, वहीं अखिलेश यादव ने मुलाकात की तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा न जाने कितनी यादें संग ले आए, जब वो आज हमारे घर पर आए और बस यही शायराना लाइन पूरे यूपी में दिल चीरनेवाली चर्चा बन गई. बता दें ये पिछले 30 दिनों में दोनों के बीच दूसरी मुलाकात थी, जिसने तमाम राजनीतिक संकेत दे दिए कि सपा के भीतर अब कोई बड़ी रणनीति पक रही है.
पुरानी ‘दास्तां’ और नया सियासी संकेत
बातचीत खत्म कर बाहर निकले आजम खान अपने पुराने तेवर में दिखे. उन्होंने कहा मैं अपनी दास्तां सुनाने आया था, जो बातें हुईं बता नहीं सकता…” आजम ने साफ कहा कि उनके परिवार ने जो भुगता है, वो किसी को नहीं झेलना चाहिए लेकिन बड़ा सियासी संकेत तब मिला जब चर्चा हुई कि आजम अब वेस्ट यूपी की कमान संभालने जा रहे हैं. उनके संगठन मजबूत करने, पुराने लोगों को जोड़ने और लगातार ‘सीक्रेट मीटिंग्स’ करने से बीजेपी खेमे में भी बेचैनी बढ़ी है. आजम का ये सक्रिय अंदाज़ बता रहा है कि वो अब बैकफुट पर नहीं, बल्कि फिर से ‘कोर लीडरशिप’ में दिखना चाहते हैं.
2027 पर आजम खान का बड़ा दांव?
अखिलेश से अब्दुल्ला के साथ की गई मुलाकात में आजम ने 2027 चुनाव पर सबसे बड़ा बयान दे दिया2027 में किसी की जरूरत नहीं होगी, हम दामन फैलाएंगे तो आंचल भर जाएगा. ये बयान सपा कार्यकर्ताओं में जोश भरने वाला साबित हुआ। जानकारों के मुताबिक ये आजम का ‘कमबैक डायलॉग’ है, जो बताता है कि जेल, मुकदमों और राजनीतिक दूरी के बावजूद उनकी पकड़ और प्रभाव अभी भी कमजोर नहीं हुआ है. क्या आजम 2027 में फिर बड़े खिलाड़ी बनेंगे? क्या अखिलेश–अब्दुल्ला की नई जोड़ी मुलायम–आजम की पुरानी साझेदारी की जगह लेगी? इन सवालों ने यूपी की सियासी हवा को और गर्म कर दिया है.
नई मुस्लिम राजनीति या नया गठजोड़?
मुलाकात की गर्माहट यहीं नहीं रुकी. इससे पहले आजम खान, मुख्तार अंसारी के बड़े भाई सिबगतुल्लाह अंसारी से मिले थे. सूत्रों के मुताबिक दोनों के बीच अल्पसंख्यक वोट बैंक, 2027 की रणनीति और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों पर चर्चा हुई. पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा भी उनसे अलग से मिले. ये सिलसिला बता रहा है कि आजम खान सिर्फ मुलाकातें नहीं कर रहे, बल्कि मुस्लिम राजनीति के नए गठजोड़ की तैयारी में हैं. जानकारों का कहना है ये सब महज औपचारिक नहीं है, बल्कि यूपी की राजनीति में एक नया मोड़ शुरू हो चुका है,