मिडिल ईस्ट तनाव के बीच अब एक और समुद्री रास्ता वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है—बाब अल-मंडेब। इसे अब “होर्मुज 2.0” कहा जा रहा है, क्योंकि इसकी अहमियत और खतरे तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। अगर इस मार्ग में रुकावट आती है, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्रीय नहीं बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
कहां है बाब अल-मंडेब और क्यों है अहम
बाब अल-मंडेब स्ट्रेट यमन और अफ्रीकी देशों जिबूती-इरीट्रिया के बीच स्थित है। यह लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ता है और स्वेज नहर के जरिए एशिया को यूरोप से जोड़ने वाला अहम मार्ग है। दुनिया का बड़ा हिस्सा व्यापार और तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए इसे रणनीतिक ‘चोकपॉइंट’ माना जाता है।
क्यों कहा जा रहा है ‘होर्मुज 2.0’
जिस तरह होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल परिवहन का बड़ा केंद्र है, उसी तरह बाब अल-मंडेब भी अब उतना ही संवेदनशील बन चुका है। यहां बढ़ते हमले, खासकर हूती विद्रोहियों द्वारा जहाजों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं ने जोखिम बढ़ा दिया है। इसी वजह से इसे “होर्मुज 2.0” कहा जाने लगा है।
ग्लोबल ट्रेड पर क्या होगा असर
अगर इस मार्ग में बाधा आती है, तो जहाजों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे यात्रा समय 10-15 दिन तक बढ़ जाता है और लागत भी बढ़ती है। इसका सीधा असर तेल, खाद्यान्न और अन्य जरूरी सामान की कीमतों पर पड़ता है। यानी दुनिया भर में महंगाई बढ़ सकती है।
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भारत पर कितना पड़ेगा असर
भारत की बड़ी मात्रा में ऊर्जा और व्यापारिक सामान इन्हीं समुद्री रास्तों से आता है। अगर बाब अल-मंडेब में संकट गहराता है, तो तेल-गैस की सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में उछाल आ सकता है। इसके अलावा आयात-निर्यात लागत बढ़ने से घरेलू बाजार भी प्रभावित हो सकता है।
खतरे क्यों बढ़ रहे हैं
इस इलाके में युद्ध, ड्रोन और मिसाइल हमले, समुद्री डकैती और सैन्य गतिविधियों में तेजी ने इसे और अस्थिर बना दिया है। अंतरराष्ट्रीय नौसेनाएं लगातार गश्त बढ़ा रही हैं, लेकिन जोखिम अभी भी बना हुआ है।
दुनिया के लिए नया अलार्म
बाब अल-मंडेब अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन बन चुका है। अगर यहां हालात बिगड़ते हैं, तो इसका असर तेल से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक हर जगह देखने को मिल सकता है—और यही वजह है कि इसे अब ‘होर्मुज 2.0’ कहा जा रहा है।