
भाद्रपद कृष्ण पक्ष की द्वादशी को मनाया जाने वाला बछ बारस का पर्व हिन्दू संस्कृति में अत्यंत पूजनीय और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे 'वत्स द्वादशी' या 'गोवत्स द्वादशी' भी कहा जाता है। इस दिन विशेष रूप से बछड़े वाली गाय (गोवत्स) की पूजा की जाती है। यह पर्व मातृत्व, करुणा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक माना जाता है।
बछ बारस क्या है?
‘बछ बारस’ शब्द दो भागों से मिलकर बना है – बछ यानी बछड़ा और बारस यानी बारहवां दिन (द्वादशी)। यह पर्व खासतौर पर महिलाओं द्वारा संतान सुख और परिवार की समृद्धि की कामना के लिए मनाया जाता है। ग्रामीण भारत में इसका विशेष महत्व है, जहां गाय को केवल पशु नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा माना जाता है।
क्यों होती है गाय और बछड़े की पूजा?
गाय को हिन्दू धर्म में माता का दर्जा प्राप्त है, जिसे 'गौमाता' कहा जाता है। वह न केवल दूध देती है, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र मानी जाती है। बछ बारस पर बछड़े वाली गाय की पूजा इस भावना के साथ की जाती है कि जैसे एक माँ अपने बच्चे से अटूट प्रेम करती है, वैसे ही मनुष्य को भी अपनी संतान, पशु और प्रकृति के प्रति दया भाव रखना चाहिए। इस दिन गाय और बछड़े को स्नान कराकर उन्हें हल्दी, रोली, चावल, फूल आदि से श्रृंगारित कर पूजा की जाती है। महिलाएं उपवास रखती हैं और पारंपरिक भोजन जैसे दाल, चने, गेंहू के बिना पकवान बनाकर अर्पित करती हैं। इस दिन अनाज नहीं खाया जाता, जिसे 'अनाज त्याग' का दिन भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यता:
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बछ बारस के दिन व्रत करने और गौमाता की सेवा करने से संतान को लंबी उम्र और परिवार को सुख-शांति प्राप्त होती है। यह व्रत विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए शुभ माना गया है जो संतान सुख की प्राप्ति की कामना रखती हैं या अपने बच्चों की कुशलता चाहती हैं। बछ बारस सिर्फ एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक ऐसा अवसर है जो हमें प्रकृति, पशु और मातृत्व के प्रति सम्मान जताने का संदेश देता है। आज के समय में जब पर्यावरण और जीवों के प्रति हमारी संवेदनाएँ कम होती जा रही हैं, ऐसे पर्व हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और हमें करुणा का महत्व सिखाते हैं।