नेपाल में भी अब दुनिया के कई देशों की तरह देश पहले वाली विदेश नीति अपनाने का ट्रेंड दिख रहा है। मंगलवार को प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की नई सरकार ने नेपाल फर्स्ट नीति अपनाने की योजना का अनावरण किया। सरकार ने कहा कि नेपाल फर्स्ट, नेपाली फर्स्ट का विचार उसकी कूटनीतिक प्राथमिकताओं के केंद्र में रहेगा। यह बात नेशनल कमिटमेंट पेपर के ड्राफ्ट में कही गई है, जिसे पांच मार्च के चुनाव में राष्ट्रीय मान्यता पाने वाली छह पार्टियों के बीच सुझाव के लिए साझा किया गया है।
ये पार्टियां हैं, राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी, नेपाली कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूएमएल), नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रिय प्रजातंत्र पार्टी और श्रम संस्कृति पार्टी। यह ड्राफ्ट पेपर नई सरकार के 100-पॉइंट गवर्नेंस रिफॉर्म एजेंडा का हिस्सा है, जो बालेंद्र शाह के 27 मार्च को प्रधानमंत्री बनने के बाद जारी किया गया था।
बराबर दूरी और बराबर नजदीकी
प्रस्ताव के अनुसार, नेपाल सभी देशों के साथ “बराबर दूरी और बराबर नजदीकी” की नीति अपनाएगा। इसके पीछे सोच यह है कि सैन्य गठबंधन, हथियारों की होड़ और युद्ध, दुनिया में शांति के लिए ठीक नहीं हैं। असल में नेपाल का भारत के साथ रिश्ता काफी गहरा और कई पहलुओं वाला है, जैसे भूगोल, संस्कृति और धर्म। दोनों ही देश हिंदू बहुल हैं।
क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करेगा
नेपाल आगे “संतुलित और गतिशील कूटनीति” अपनाना चाहता है, ताकि बदलती दुनिया की राजनीति को अपने विकास के मौके में बदला जा सके। साथ ही, देश अपनी संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय हितों को सबसे ऊपर रखेगा। सरकार का यह भी कहना है कि नेपाल अपने पड़ोसी शक्तिशाली देशों के उभार और बदलती वैश्विक परिस्थितियों का फायदा उठाकर आर्थिक विकास तेज करेगा, निवेश बढ़ाएगा और क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करेगा।
पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति को जारी रखेगा
इस नीति के तहत नेपाल अपनी पारंपरिक गुटनिरपेक्ष नीति को जारी रखेगा, लेकिन साथ ही व्यवहारिक, लचीली और नतीजों पर ध्यान देने वाली कूटनीति अपनाएगा। सरकार ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि नेपाल खुद को सिर्फ “बफर स्टेट” (दो बड़े देशों के बीच फंसा हुआ देश) के रूप में नहीं, बल्कि एक “सक्रिय पुल” के रूप में बदले। भारत और चीन जैसे दो बड़े देशों के बीच स्थित नेपाल को लंबे समय से एक बफर स्टेट माना जाता रहा है।