बांग्लादेश से आई ताजा खबर ने एक बार फिर इंसानियत को झकझोर दिया है। ढाका से करीब 150 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाले खोकन चंद्र दास पर कट्टरपंथियों ने जानलेवा हमला किया। वह दवा और मोबाइल बैंकिंग का छोटा कारोबार करते थे और रात में दुकान बंद कर घर लौट रहे थे। तभी घात लगाए हमलावरों ने उन पर हमला किया और जिंदा जलाने की कोशिश की। आग से बचने के लिए वह तालाब में कूदे लेकिन गंभीर रूप से झुलस गए। अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। यह घटना उस डर को उजागर करती है जो अल्पसंख्यकों के जीवन पर लगातार मंडरा रहा है।
तीन मौतों से सवालों की बौछार
खोकन दास का नाम अब उन हिंदुओं की सूची में जुड़ गया है जो हाल के दिनों में हिंसा का शिकार बने। इससे पहले दिसंबर में दीपू चंद्र दास की हत्या और शव जलाने की खबर सामने आई थी। कुछ ही दिनों बाद अमृत मंडल को पीट पीटकर मार डाला गया। फिर 29 दिसंबर को बजेंद्र बिस्वास की मौत ने हालात और गंभीर कर दिए। तीन तीन मौतों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के दावे आखिर जमीन पर क्यों कमजोर दिख रहे हैं। सरकार के स्पष्टीकरण अपनी जगह हैं लेकिन डर और असुरक्षा की तस्वीरें ज्यादा बोल रही हैं।
भारत में गुस्सा और सियासी हलचल
इन घटनाओं के बाद भारत में आक्रोश साफ नजर आ रहा है। सोशल मीडिया पर लाखों लोग सवाल उठा रहे हैं और सड़कों पर भी नाराजगी दिख रही है। पश्चिम बंगाल बीजेपी ने इसे धार्मिक हिंसा बताते हुए गंभीर चिंता जताई है। भारत सरकार पहले भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती घटनाओं पर नजर रखने की बात कह चुकी है। सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah तक पूरी रिपोर्ट पहुंच चुकी है और अब सिर्फ बयान नहीं बल्कि कड़े संदेश की तैयारी की चर्चा है।
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कूटनीति पर बढ़ा दबाव
इस पूरे मामले ने विदेश नीति के स्तर पर भी दबाव बढ़ा दिया है। हाल ही में विदेश मंत्री S. Jaishankar बांग्लादेश दौरे पर गए थे जहां अल्पसंख्यकों की सुरक्षा का मुद्दा अहम रहा। खोकन दास की मौत के बाद यह विषय फिर केंद्र में आ गया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार सुरक्षा के दावे कर रही है लेकिन जमीनी हालात उन दावों को चुनौती दे रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों ने भी चिंता जताई है। भारत में अब यही चर्चा है कि क्या इस बार ठोस कार्रवाई का वक्त आ गया है और क्या बांग्लादेश को साफ और सख्त संदेश मिलेगा।