अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने दक्षिण एशिया की आर्थिक राजनीति में हलचल मचा दी है। चुनावी माहौल के बीच वॉशिंगटन ने ढाका को बड़ी राहत देते हुए उसके उत्पादों पर लगने वाला रेसिप्रोकल टैरिफ घटाकर 19 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि यह फैसला बांग्लादेश के लिए संजीवनी जैसा माना जा रहा है, लेकिन वह भारत के बराबर रियायत हासिल नहीं कर पाया।
अमेरिका-बांग्लादेश डील का नया अध्याय
नई ट्रेड डील के तहत दोनों देशों ने बाजार खोलने, शुल्क घटाने और निवेश बढ़ाने पर सहमति जताई है। समझौते के अनुसार बांग्लादेश अपने बाजार में अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों को विशेष रियायत देगा। इनमें मशीनरी, मेडिकल उपकरण, वाहन व उनके पुर्जे, आईसीटी उपकरण, ऊर्जा उत्पाद, सोया, डेयरी, बीफ, पोल्ट्री, मेवे और फल जैसे सेक्टर शामिल हैं।
टैरिफ में कटौती और जीरो ड्यूटी का रास्ता
अमेरिका ने बांग्लादेशी सामानों पर 20 प्रतिशत से घटाकर 19 प्रतिशत टैरिफ तय किया है। साथ ही कुछ चुनिंदा उत्पादों को जीरो टैरिफ पर प्रवेश देने की व्यवस्था भी की जाएगी। कपड़ा और परिधान उद्योग को भी फायदा मिलने की उम्मीद है, हालांकि यह राहत अमेरिका से आयात किए जाने वाले कपास और आर्टिफिशियल फाइबर की मात्रा से जुड़ी होगी।
नॉन-टैरिफ बाधाओं पर भी वार
समझौते में व्यापार में रुकावट बनने वाली गैर-शुल्कीय बाधाओं को हटाने पर जोर दिया गया है। बांग्लादेश अमेरिकी वाहन सुरक्षा मानकों, दवाओं और मेडिकल उपकरणों से जुड़े प्रमाणपत्रों को मान्यता देगा। इसके अलावा सीमा शुल्क प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण, डेटा के मुक्त ट्रांसफर, बीमा क्षेत्र में सुधार, श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
बड़े निवेश और खरीद की योजना
व्यावसायिक स्तर पर बांग्लादेश अमेरिका से लगभग 3.5 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद, आने वाले 15 वर्षों में 15 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पाद और विमानों की खरीद की योजना बना रहा है। साथ ही बौद्धिक संपदा अधिकारों की सख्त सुरक्षा और अमेरिकी डेयरी व मांस उत्पादकों के हितों की रक्षा को भी समझौते में जगह दी गई है।
भारत से तुलना में क्यों पिछड़ा ढाका?
पिछले साल व्यापार असंतुलन का हवाला देकर लगाए गए भारी शुल्कों में भारत को हालिया समझौते में 18 प्रतिशत तक राहत मिली थी। इसके बाद बांग्लादेश ने भी जोरदार कोशिश की, लेकिन उसका टैरिफ 19 प्रतिशत पर ही सिमट गया। इस तरह वह भारत की बराबरी नहीं कर सका और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा में एक कदम पीछे ही रह गया।