एक सिद्ध पीठ स्थल..... 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, देवी मंदिर । मंदिर पर पहुंचने के लिए भक्तों को 1400 सीढ़ियों चढ़ना पड़ता है अब रोप-वे की सुविधा उपलब्ध है, जिसकी मदद से यहां 5 मिनट में पहुंचा जा सकता है, देवी मां का मंदिर है भोपाल से 75 किमी दूर है।
भोपाल। चैत्र नवरात्र से प्रारंभ हो चुके हैं। इस दौरान राजधानी के से 75km दूर स्थित है, सलकनपुर देवी मंदिर । इस मंदिर में लाखों की संख्या में लोग देवी दर्शन के लिए आते हैं। किवदंती है, कि इस मंदिर की स्थापना एक बंजारों ने की थी।
इस मंदिर में देवी मां दिन में तीन बार रूप बदलती हैं, यहां देवी मंदिर 1000 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर पर पहुंचने के लिए भक्तों को 1400 सीढ़ियों चढ़नी पड़ती हैं, कुछ वर्षों से इस पहाड़ी पर में सड़क मार्ग भी जाया जा सकता है। इसके अलावा दर्शनार्थियों के लिए रोप-वे भी शुरू हो गया है, जिसकी मदद से यहां 5 मिनट में पहुंचा जा सकता है।
लोगों के कष्ट हरने वाली माता....
कहते हैं मां बिजासन के दरबार में भक्तों की कोई भी मुराद खाली नहीं जाती। माना जाता है कि मां विजयासन देवी पहाड़ पर अपने परम दिव्य रूप में विराजमान हैं। विध्यांचल पर्वत श्रंखला पर विराजी माता को विध्यवासिनी देवी भी कहा जाता है। इसका पुराणों में भी बखान है, पुराणों के अनुसार देवी विजयासेन माता पार्वती का ही प्रतिरूप हैं, जिन्होंने देवताओं के आग्रह पर रक्तबीज नामक राक्षस का वध किया था और सृष्टि की रक्षा की थी विजयासन माता कई लोगों की भी हैं।
विजयासेन धाम की उत्पत्ति....
मां विजयासन धाम की उत्पत्ति, प्राकट्य, मंदिर निर्माण को लेकर जिज्ञाषा लोगों के मन में रही है। लेकिन अभी तक इसके कोई भी ठोस साक्ष्य और प्रमाण नही मिल पाए हैं। कुछ पंडितो का कहना है कि यहां मां का आसन गिरने से यह विजयासन धाम बना लेकिन विजय शब्द का योग कैसे हुआ, इसका सटीक उत्तर वे किसी के पास नहीं। लेकिन मां विजायासन धाम के प्राकट्य का सटीक उत्तर व उल्लेख श्रीमद् भागवत महापुराण में है।
सलकनपुर मां विजयासन देवी मंदिर..
श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार जब रक्तबीज नामक दैत्य से त्रस्त होकर जब देवतागण देवीमां की शरण में पहुंचे। तो देवी ने विकराल रूप धारण कर इसी स्थान पर रक्तबीज का संहार कर उस पर विजय प्राप्त की । देवी मां की इस विजय पर देवताओं ने जो आसन दिया, उसे ही विजयासन धाम के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बनजारे ने की थी देवी की स्थापना..
आज से तकरीबन 300 साल पहले बंजारे को स्वप्न में देवी ने दर्शन दिए । और स्वप्न में मूर्ति के बारे में बताया और मूर्ति स्थापना की बात कही । मंदिर निर्माण और प्रतिमा मिलने की इस कथा के अनुसार पशुओं का व्यापार करने वाले बंजारे इस स्थान पर विश्राम और चारे के लिए रूके। अचानक ही उनके पशु अदृष्य हो गए।
बंजारे को मिली थी बालिका....
इस तरह बंजारे पशुओं को ढूंडने के लिए निकले, तो उनमें से एक बृद्ध बंजारे को एक बालिका मिली। बालिका के पूछने पर उसने सारी जानकारी दी । तब बालिका ने कहा की आप यहां देवी के स्थान पर पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना पूर्ण कर सकते हैं। तब बालिका ने संकेत स्थान पर एक पत्थर फेंका। जिस स्थान पर पत्थर फेंका वहां मां भगवति के दर्शन हुए। उन्होने मां भगवति की पूजा-अर्चना की। कुछ ही क्षण बाद बंजारे के खोए पशु मिल गए। मन्नत पूरी होने पर बंजारों ने मिलकर मंदिर का निर्माण करवाया।
मंदिर के रास्ते में जंगल होने और जंगल में हिंसक जानवरों, चौसठ योग-योगिनियों का स्थान होने से कुछ लोग यहां पर आने में संकोच करते थे। तब वहां के स्वामी भद्रानंद ने यहां तपस्या कर चौसठ योग-योगिनियों के लिए एक स्थान स्थापित किया। तथा मंदिर के समीप ही एक धुने की स्थापना की। और इस स्थान को चैतन्य किया है। तथा धुने में एक अभिमंत्रित चिमटा, जिसे तंत्र शक्ति से अभिमंत्रित कर तली में स्थापित किया गया है। आज भी इस धुने की भवूत को ही मुख्य प्रसाद के रूप में भक्तगणों को वितरित किया जाता है।