सरकार ने संसद में बताया कि पिछले पांच सालों में देश के बैंकों में 1.42 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बैंक धोखाधड़ी के मामले सामने आए हैं। वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने राज्यसभा में लिखित जवाब में बताया कि यह जानकारी भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) से प्राप्त आंकड़ों पर आधारित है। इसमें सरकारी, निजी, विदेशी, स्मॉल फाइनेंस, पेमेंट और अन्य बैंकों का डेटा शामिल है।
रिकवरी रही बेहद कम
सरकार के मुताबिक, 1,42,112 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी वाली रकम में से अब तक सिर्फ 6,389 करोड़ रुपये ही रिकवर किए जा सके हैं। यानी कुल राशि का लगभग 4.5% ही वापस मिल पाया है। सरकार ने कहा कि धोखाधड़ी वाले खातों से रकम की वसूली की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है।
विलफुल डिफॉल्टर्स पर कार्रवाई
सरकार ने बताया कि 31 मार्च 2026 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों के खिलाफ 15,577 रिकवरी केस दायर किए हैं। इसके अलावा 10,894 मामलों में SARFAESI Act के तहत कार्रवाई शुरू की गई, जबकि 7,173 एफआईआर भी दर्ज की गई हैं।
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रिकवरी कम क्यों हो पाती है?
सरकार के अनुसार, बड़े बैंक फ्रॉड की पहचान करने और उसे आधिकारिक रूप से धोखाधड़ी घोषित करने में अक्सर 2 से 5 साल तक का समय लग जाता है। इस दौरान आरोपी कई बार रकम को दूसरी कंपनियों, विदेशी खातों, बेनामी संपत्तियों या अन्य माध्यमों में स्थानांतरित कर देते हैं। लंबी कानूनी प्रक्रिया और संपत्तियों की बिक्री में देरी भी रिकवरी की रफ्तार को प्रभावित करती है।
RBI की भूमिका पर क्या कहा गया?
सरकार ने बताया कि RBI जानबूझकर कर्ज नहीं चुकाने वालों के खिलाफ अलग-अलग मामलों में की गई कार्रवाई का रिकॉर्ड नहीं रखता। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से मिली जानकारी के आधार पर ऐसे मामलों में कानूनी और रिकवरी संबंधी कदम उठाए जा रहे हैं।
बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ी चुनौती
संसद में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि बैंक धोखाधड़ी और फंसे हुए कर्ज की समस्या अब भी बैंकिंग व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। सरकार का कहना है कि रिकवरी और कानूनी कार्रवाई लगातार जारी है, लेकिन पूरी राशि वापस लाने की प्रक्रिया कई मामलों में लंबी और जटिल बनी रहती है।