बरेली के मुख्य शिव मंदिरों में सावन शुरू होते ही भारी भीड़ उमड़ती है, जहां भक्त भगवान शिव को जल अर्पित करने के लिए घंटों लाइन में खड़े रहते हैं. इसे ध्यान में रखते हुए प्रशासन और मंदिर प्रबंधन ने पहले से ही सफाई, यात्री विश्राम शिविर, जल-अर्पण व्यवस्था, सुरक्षा और यातायात प्रबंधन जैसी तैयारियाँ शुरु कर दी हैं. सांसद और जिला प्रशासन ने प्रण लिया है कि इस सावन में श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएँ और परेशानी-मुक्त अनुभव मिलेगा.
बरेली अपनी “नाथ नगरी” पहचान के कारण देशभर में प्रसिद्ध है, जहाँ की चारों दिशाओं में शिव मंदिर जैसे अलाखा नाथ, त्रिवटी नाथ, मधी नाथ और धोपेश्वर नाथ भगवान भोलेनाथ की भव्य उपस्थिति दर्शाते हैं. सावन का महीना 11 जुलाई से शुरू हो रहा है और इस अवसर पर इन मंदिरों में साफ‑सफाई, जल अभिषेक की सुनियोजित व्यवस्था और भक्तों के विश्राम की सुविधाएँ प्रशासन और मंदिर प्रबंधन द्वारा पहले से ही शुरू कर दी गई हैं ताकि बड़ी कतारों में आने वाली भीड़ बिना किसी परेशानी के श्रद्धापूर्वक पूजा कर सके. मणिनाथ मंदिर, जो लगभग 200 वर्ष पुराना है, अपनी खास मान्यता के लिए प्रसिद्ध है. इस शिवलिंग से प्राचीन समय में दूध बहने की कहानी जुड़ी रही है. हालांकि अब दूध नहीं आता पर भक्तों का विश्वास अटूट है कि यदि कोई सच्चे दिल से मनोकामना लेकर यहाँ आता है, तो भोलेनाथ उसकी मन्नत अवश्य पूरी करते हैं.
मरघट वाले बाबा महादेव के प्राचीन मंदिर
बरेली तब और खास बन जाती है जब सावन का महीना आता है, तो यहां स्थित मरघट वाले बाबा महादेव के प्राचीन मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है. यह मंदिर जो शहर के सिटी शमशान के पास स्थित है, सावन के दौरान जल अभिषेक और विशेष पूजा-अर्चना के लिए जाना जाता है. हजारों कांवड़ यात्री यहाँ गंगाजल, दूध और पुष्प लेकर पहुंचते हैं और मरघट वाले बाबा की कृपा पाने की मन्नत मांगते हैं. मान्यता है कि बाबा की कृपा से भक्तों की मुराद ज़रूर पूरी होती है. इस पावन महीने में मंदिर प्रबंधन ने भीड़ संभालने, जल चढ़ाने की सुविधाएँ और साफ‑सफाई का काम पहले ही शुरू कर दिया है ताकि श्रद्धालु बिना किसी परेशानी के भक्ति में लीन हो सकें.
बरेली की “नाथ नगरी” में स्थित लगभग 500 साल पुराना धोपेश्वर मंदिर, जिसे स्थानीय “धोपा मंदिर” कहते हैं. सावन के पावन माह में विशेष श्रद्धा और मान्यता का केंद्र बन जाता है. शिव चालीसा का पाठ और यहां बने प्राचीन कुंड में स्नान करने से भक्तों का विश्वास है कि चर्मरोग जैसी समस्याएँ दूर हो जाती हैं. 11 जुलाई से शुरू हो रहे सावन के दौरान कांवड़ यात्री दूर-दूर से कछलाठन से जल लाकर बाबा महादेव को जलाभिषेक करते हैं और मान्यता है कि उनकी मन्नतें पूरी होती हैं. इस तैयारियों के मद्देनज़र मंदिर प्रशासन ने भीड़ के प्रबंधन, जल चढ़ाने की व्यवस्था और साफ‑सफाई की तैयारी पहले ही शुरू कर दी है.
अलखनाथ मंदिर
बरेली की “नाथ नगरी” का प्राचीन अलखनाथ मंदिर जो करीब 930 साल पुराना है, सावन के पावन महीने में शिवभक्तों की आस्था का केंद्र बन जाता है. भक्त दूर-दूर से कावड़ लेकर चाहे वह कछलदान हो या हरिद्वार गंगाजल लाते हैं ताकि बाबा भोलेनाथ को जलाभिषेक कर उनकी मन्नत प्राप्त हो सके. सावन की तैयारियों के तहत मंदिर प्रबंधन ने साफ-सफाई, पूजा व्यवस्था और जल चढ़ाने की सुविधाएं पहले ही शुरू कर दी हैं, ताकि बड़ी संख्या में कावड़ यात्री बिना किसी असुविधा के दौड़ धूप में भक्ति कर सकें.
त्रिवटी नाथ मंदिर
बरेली के त्रिवटी नाथ मंदिर को शिवभक्तों की गहरी आस्था का स्थल माना जाता है. यह मंदिर बरेली शहर के बाहरी क्षेत्र में स्थित है और शहर के चारों कोनों में बने प्राचीन नाथ मंदिरों में से एक है. लोक मान्यता के अनुसार, लगभग 600 साल पहले एक चरवाहे को त्रिवटी नाथ ने तीन बरगदों के नीचे शिवलिंग का दर्शन कराया था, जिसके बाद से यह मंदिर भक्तों की मन्नतों का केंद्र बन गया है. सावन के दौरान खासकर सोमवार व शिवरात्रि पर श्रद्धालुओं की लाइन लग जाती है, जो गंगाजल, कछला या हरिद्वार से लाई जल से करोड़ों किलोमीटर दूर आकर बाबा का अभिषेक करते हैं. इस माह की तैयारियों के तहत मंदिर संचालन ने जल चढ़ाने की सुव्यवस्था, साफ-सफाई और भीड़ नियंत्रण की व्यवस्थाएँ पहले ही शुरू कर दी हैं, ताकि भक्तों को निर्बाध भक्ति अनुभव मिल सके.
श्री तपेश्वर नाथ मंदिर
बरेली के नाथनगर में स्थित लगभग 400 साल पुराना श्री तपेश्वर नाथ मंदिर जो सुभाष नगर में स्थित है, आदिकाल से ऋषिमुनियों की तपस्थली रहा है. इसका नाम तपेश्वर इसलिए पड़ा क्योंकि एक संत ने यहां 400 वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे यह स्थल आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया. मंदिर में स्थापित विशाल शिवलिंग पर सावन के दौरान दूर-दूर से कांवड़ यात्री गंगाजल लेकर जलाभिषेक करते हैं और बाबा से अपनी मन्नत पूरी होने की उम्मीद रखते हैं. सावन का महीना शुरू होने से पहले ही मंदिर और प्रशासन द्वारा भक्तों की सुविधा और साफ-सफाई की तैयारियाँ शुरू कर दी गई हैं, ताकि बड़ी संख्या में आने वाले श्रद्धालुओं को बिना किसी परेशानी के भक्ति में लीन होने का मौका मिल सके.
धोपेश्वर नाथ मंदिर (धोपा मंदिर)
बरेली कैंट क्षेत्र में स्थित धोपेश्वर नाथ मंदिर (धोपा मंदिर) लगभग 5000 साल पुराना है. पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत काल में द्रौपदी के गुरु ऋषि धूम ने यहाँ तपस्या की और उनके समाधि स्थल पर शिवलिंग की स्थापना हुई थी. यह मंदिर सावन के दौरान शिवभक्तों के लिए विशेष आस्था का केंद्र बन जाता है क्योंकि लोग यहाँ शिव चालीसा पाठ करते हैं और मंदिर के पुरातन कुंड में स्नान करने से चर्म रोग दूर होने की मान्यता है. सावन के महीने में दूर-दूर से कांवड़ यात्री कछलाघाट, हरिद्वार या गंगाजल लेकर आते हैं और भारी भीड़ में जलाभिषेक करते हैं. इसी वजह से मंदिर और प्रशासन ने जल चढ़ाने की व्यवस्था, साफ-सफाई और भीड़ नियंत्रण की तैयारियाँ पहले ही शुरू कर दी हैं, ताकि भक्त बिना किसी परेशानी के भक्ति कर सकें.