जब भी कोई नया शहर बसता है, तो उसकी आत्मा कोई न कोई नाम देता है। नोएडा की आत्मा के एक टुकड़ा का नाम 1980 के दशक में ब्रिगेडियर एम.एल. खेत्रपाल ने रखा था। सेक्टर 28, 29 और 37 को मिलाकर बना पूरा रिहायशी इलाका उन्होंने अपने शहीद बेटे के नाम कर दिया – अरुण विहार। उस दिन शिलान्यास के पत्थर पर हाथ रखते हुए शायद ब्रिगेडियर साहब को पता भी नहीं था कि चार दशक बाद कोई और बूढ़ा शेर उनकी जगह खड़ा होकर उसी बेटे को फिर से गले लगाएगा।वो बूढ़ा शेर थे – धर्मेंद्र।
2025 में जब फिल्म “इक्कीस” की शूटिंग चल रही थी, तो खेत्रपाल परिवार पहली बार सेट पर पहुँचा। दिल्ली के वसंत विहार से आया वो परिवार जब धर्मेंद्र को ब्रिगेडियर साहब की यूनिफॉर्म में देखा, तो अरुण के छोटे भाई मुकेश खेत्रपाल की आँखें भर आईं। मुकेश खेत्रपाल ने दैनिक लोकसत्य से बातचीत में बताया कि
“एक पल को लगा, पापा वापस आ गए हैं।”धर्मेंद्र ने माँ महेश्वरी जी के पैर छुए, मुकेश को गले लगाया और धीरे से कहा,
“मैंने सिर्फ रोल नहीं निभाया, तुम्हारे पापा को जीया है। अरुण मेरा बेटा बन गया।”
फिल्म अभी रिलीज़ भी नहीं हुई थी कि 24 नवंबर 2025 को धर्मेंद्र चले गए। नोएडा की सरजमीं पर उनका पैर कभी नहीं पड़ा, लेकिन फिर भी वो यहाँ के हो गए। कैसे? क्योंकि अब जब भी कोई अरुण विहार के गेट से गुज़रेगा,
जब कोई बच्चा पार्क में खेलेगा,
जब कोई बुजुर्ग शाम की सैर करेगा,
तो अनायास ही कोई कहेगा –
“यार, ये वही जगह है न, जहाँ धर्मेंद्र पाजी अपने ‘बेटे’ अरुण के पापा बने थे।”
25 दिसंबर 2025 को जब “इक्कीस” थिएटर्स में आएगी, तो नोएडा के हर सिनेमा हॉल में एक साथ दो पिता दिखेंगे –
एक जो 1971 में बेटे को खो चुके थे,
दूसरे जो 2025 में खुद चले गए, लेकिन जाते-जाते नोएडा को अपना बना गए।धर्मेंद्र नोएडा नहीं आए,
लेकिन नोएडा अब उन्हें कभी नहीं भूलेगा।
क्योंकि अरुण विहार की हर गली में अब दो नाम गूँजते हैं –
अरुण खेत्रपाल… और उनके पर्दे के पिता, धर्मेंद्र।पाजी, आप सच में चले गए,
पर इस शहर में आपकी आखिरी फिल्म ने आपको हमेशा के लिए बसा दिया।
शुक्रिया “इक्कीस”।
शुक्रिया पाजी।
अब आप यहाँ के अपने हो।
हमेशा।जय हिंद। जय अरुण। जय धर्मेंद्र।