उत्तर प्रदेश की राजनीति में जिलों और शहरों के नाम बदलना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं रहा है। इसके पीछे पहचान, विरासत और सामाजिक समीकरणों की राजनीति भी जुड़ी रही है। भदोही इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को जिले को फिर ‘संत रविदास नगर भदोही’ के नाम से जाने जाने की घोषणा की। इसके साथ ही करीब तीन दशक से चल रही नाम की सियासत एक बार फिर चुनावी बहस के केंद्र में आ गई है।
इतिहास देखें तो भदोही का नाम पहली बार चार दिसंबर 1997 को तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने बदलकर संत रविदास नगर किया था। 1999 में भाजपा सरकार ने इसमें भदोही जोड़कर ‘संत रविदास नगर भदोही’ कर दिया। इसके बाद 2014 में अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार ने मायावती के फैसले को पलटते हुए जिले का नाम फिर भदोही कर दिया।
राजनीतिक संदेश और स्पष्ट कर दिया
अब योगी सरकार ने उसी नाम को दोबारा स्थापित करने का फैसला किया है। दिलचस्प यह है कि योगी ने जुलाई में संत रविदास की 650वीं जयंती के मौके पर ही नाम बदलने की घोषणा कर दी थी। रविवार को भदोही में इसे फिर प्रमुखता से सामने रखकर सरकार ने इस फैसले का राजनीतिक संदेश और स्पष्ट कर दिया।
राजनीति को मजबूत करने की कोशिश
यही वह बिंदु है जहां 2027 का चुनाव इस फैसले से जुड़ता है। संत रविदास की विरासत पर बसपा लंबे समय से अपना मजबूत दावा करती रही है। सपा ने मायावती सरकार के नामकरण को पलटकर अलग राजनीतिक संदेश दिया था। अब भाजपा उसी नाम को बहाल करके दलित समाज के भीतर संत रविदास की व्यापक स्वीकार्यता और सामाजिक समरसता की अपनी राजनीति को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
सामाजिक समीकरण को साधने में जुटी
योगी सरकार के लिए यह सिर्फ नाम की वापसी नहीं है। जुलाई से शुरू किए गए संत रविदास केंद्रित कार्यक्रमों, समरसता अभियान और अब जिले के नाम की बहाली को एक साथ देखें तो यह दलित मतदाताओं तक पहुंच बनाने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है। खासकर तब, जब सपा 2027 के लिए पीडीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को साधने में जुटी है।
राजनीतिक आधार तैयार कर सकता है
भाजपा के लिए चुनौती यह है कि वह दलित प्रतीकों के सम्मान को केवल नाम बदलने तक सीमित न दिखने दे। भदोही में 1340 करोड़ रुपये से अधिक की 112 परियोजनाओं और कालीन उद्योग के विस्तार को इसी संदेश के साथ जोड़ना सरकार के लिए ज्यादा प्रभावी राजनीतिक आधार तैयार कर सकता है। यानी नाम वही पुराना, लेकिन 2027 का राजनीतिक संदेश नया है। योगी सरकार ने मायावती की विरासत को अपनाकर सपा से अलग खड़ी होने और दलित प्रतीक की राजनीति में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश की है। यही इस नाम वापसी का सबसे बड़ा चुनावी मर्म है।