सनातन परंपरा में पूजा-पाठ के दौरान भगवान को भोजन अर्पित करने की विशेष परंपरा रही है। घर में पूजा हो या कोई धार्मिक अनुष्ठान, भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान को भोग लगाते हैं। पूजा पूरी होने के बाद इसी भोग को प्रसाद मानकर परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में बांटा जाता है। हालांकि, भोग लगाने के तरीके से लेकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करने तक कई धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। कहा जाता है कि भगवान को भोग लगाने के बाद उसे न तो तुरंत हटा देना चाहिए और न ही लंबे समय तक पूजा स्थल पर पड़ा रहने देना चाहिए। आइए जानते हैं भोग और प्रसाद से जुड़ी किन बातों का ध्यान रखें।
भोग कितनी देर तक भगवान के सामने रखें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान को भोग अर्पित करने के बाद कुछ समय के लिए उसे उनके सामने रखा जाता है। आमतौर पर भोग को कम से कम 5 मिनट तक पूजा स्थल पर रखने की बात कही जाती है। इसके बाद करीब 15 से 20 मिनट के अंदर भोग को वहां से हटाकर प्रसाद के रूप में बांटने की परंपरा है।
पूजा की जगह पर घंटों न छोड़ें भोग
अक्सर लोग पूजा खत्म होने के बाद भोग को मंदिर या पूजा स्थल पर ही छोड़ देते हैं। कई बार यह भोग कई घंटों तक वहीं रखा रहता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे उचित नहीं माना जाता। मान्यता है कि भोग को लंबे समय तक खुले में छोड़ने के बजाय समय पर उठाकर प्रसाद के तौर पर ग्रहण करना चाहिए।
भोग को फर्श पर रखने से बचें
भगवान को चढ़ाया जाने वाला भोग सीधे जमीन या फर्श पर रखने की परंपरा नहीं है। इसके लिए साफ थाली या किसी स्वच्छ ऊंची जगह का इस्तेमाल करना बेहतर माना जाता है। परंपरागत मान्यताओं में पीतल, तांबा, कांसा, चांदी और सोने के बर्तनों को पूजा और भोग के लिए शुभ माना गया है। वहीं कई धार्मिक परंपराओं में प्लास्टिक, कांच और एल्यूमिनियम के बर्तनों में भोग लगाने से बचने की सलाह दी जाती है।
भोग लगाते समय इन बातों का रखें ध्यान
भोग लगाते समय इस बात का ध्यान रखें कि प्रसाद साफ-सुथरा हो और उसे ढककर भगवान के सामने रखा जाए। साथ ही, भगवान के पास एक पात्र में जल रखने की भी परंपरा है। कई घरों और मंदिरों में भोग लगाते वक्त कुछ देर के लिए पूजा स्थल का पर्दा भी कर दिया जाता है। मान्यता है कि भगवान को एकांत में भोग अर्पित करने की परंपरा के चलते ऐसा किया जाता है। भोग लगाने के बाद उसे प्रसाद के रूप में श्रद्धा से ग्रहण करें और घर के बाकी सदस्यों के साथ भी बांटें। इससे प्रसाद सभी तक पहुंचता है और पूजा की परंपरा भी पूरी होती है।
Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. loksatya इसकी पुष्टि नहीं करता है।