अयोध्या के नंदीग्राम स्थित भरत कुंड को धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। पितृपक्ष के अवसर पर हजारों श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पिंडदान और तर्पण करने आते हैं। खास बात यह है कि भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध इसी स्थान पर किया था। धार्मिक मान्यता है कि भरत कुंड में पिंडदान करने से गया तीर्थ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। इस पावन स्थल को मिनी गया भी कहा जाता है।
भरत कुंड – एक पवित्र स्थल
अयोध्या से करीब 16 किलोमीटर दूर नंदीग्राम में स्थित भरत कुंड धार्मिक आस्था का केन्द्र बना हुआ है। यह स्थान उस समय की याद दिलाता है जब भगवान राम ने अपने पिता राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म संपन्न किया था। मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरणचिह्न भी यहीं विद्यमान हैं। भरत कुंड को मिनी गया की उपाधि इसलिए दी गई क्योंकि यहां पिंडदान करने से वही पुण्य प्राप्त होता है जो गया तीर्थ में होता है।
पितृपक्ष में श्रद्धालुओं की भीड़
पितृपक्ष के दौरान भरत कुंड पर विशेष श्रद्धा देखने को मिलती है। आसपास के जिलों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां पितरों की आत्मा की शांति हेतु पिंडदान और तर्पण करते हैं। पंडित अनुराग पांडे के अनुसार, हर वर्ष पितृपक्ष में यह स्थल श्रद्धालुओं से भर जाता है। श्रद्धालु दूर-दूर से आने का उद्देश्य पवित्र परंपरा का पालन करते हुए अपने पूर्वजों को सुख व शांति प्रदान करना होता है।
भरत कुंड की ऐतिहासिक और धार्मिक गाथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान राम जब वनवास को जा रहे थे, तब उनके अनुज भरत जी ने सिर पर खड़ाऊ रखकर यहीं पर चौदह वर्षों तक तपस्या की थी। यही कारण है कि इसे भरत की तपोस्थली भी कहा जाता है। कहा जाता है कि यहां पिंडदान करने से न केवल पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है, बल्कि यह स्थल व्यक्ति के समस्त पापों से मुक्ति दिलाता है।
श्रद्धालुओं की मान्यता और अनुभव
अयोध्या आए एक श्रद्धालु ने बताया, “हम गोंडा से आए हैं। यहां पितरों के लिए पिंडदान और तर्पण करने का अनुभव बहुत ही अद्भुत है। यह स्थान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यहां आने से आत्मा को शांति भी मिलती है।” श्रद्धालुओं का मानना है कि भरत कुंड में श्राद्ध करने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उन्हें स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग खुलता है।