
Bhopal metro budget:भोपाल मेट्रो प्रोजेक्ट की धीमी रफ्तार और लेटलतीफी ने इसका बजट पूरी तरह बिगाड़ दिया है। मेट्रो की प्रति किलोमीटर लागत अब 231 करोड़ से बढ़कर 357.71 करोड़ रुपये हो गई है। कुल बजट 10,500 करोड़ से भी ज्यादा पहुंच चुका है। पहले जहां दो प्राथमिक लाइनें 2027 तक पूरी होनी थीं, अब उन्हें 2030 तक खींचा जा रहा है। यह न केवल समय की बर्बादी है, बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई भी पानी की तरह बह रही है।
लगातार बढ़ता बजट, थमती रफ्तार
भोपाल मेट्रो के लिए 30 किमी लंबे रूट पर 2019 में अनुमानित खर्च 6,941 करोड़ रुपये था, जो अब बढ़कर 10,731 करोड़ हो गया है। यानी प्रति किलोमीटर 126.71 करोड़ की लागत का इजाफा हुआ है। 6.22 किमी के प्रायोरिटी कॉरिडोर पर 2,225 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। मेट्रो के अधिकारियों का कहना है कि अब काम की निगरानी सख्ती से की जा रही है, लेकिन हकीकत में औसतन 3 मीटर प्रतिदिन की रफ्तार से काम हो रहा है।
2030 तक पूरी होंगी शुरुआती दो लाइनें
शुरुआती दो मेट्रो लाइनें जो पहले 2027 तक बननी थीं, अब उनकी समयसीमा बढ़ाकर 2030 कर दी गई है। इसका सीधा असर बजट पर पड़ेगा। मेट्रो प्रबंधन ने स्वीकार किया है कि काम में देरी हुई है, लेकिन अब तेज़ी लाने की कोशिश की जा रही है।
सिर्फ 10% लोग ही करेंगे उपयोग
एम्स से सुभाष ब्रिज तक बनने जा रहे प्रायोरिटी कॉरिडोर पर ट्रैफिक डेटा चौंकाने वाला है। यहां केवल 10% लोग ही सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं। जबकि प्रतिदिन करीब 6,000 निजी वाहन इस रूट से गुजरते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस पर हुआ भारी खर्च वास्तव में कारगर साबित होगा?
मेट्रो की मौजूदा स्थिति: आंकड़ों में
357.71 करोड़ रु./किमी की लागत
6.22 किमी रूट पर खर्च: 2,225 करोड़
14 एलीवेटेड + 2 अंडरग्राउंड स्टेशन (करोंद-एम्स रूट)
1.79 किमी अंडरग्राउंड सेक्शन
2.15 लाख दैनिक यात्री अनुमानित
फायनल ट्रायल रन: 3 अक्टूबर 2025
कमर्शियल रन का दावा: अक्टूबर 2025
लंबी राह और गहरी चिंता
भोपाल मेट्रो प्रोजेक्ट अब शहरी विकास के बजाय एक दीर्घकालिक खर्चीले प्रयोग में बदलता जा रहा है। धीमी प्रगति, लगातार बढ़ता बजट और सीमित उपयोगिता – ये सभी पहलू इस परियोजना की गंभीर समीक्षा की मांग करते हैं। अगर समय और संसाधनों का सही उपयोग नहीं हुआ, तो यह प्रोजेक्ट एक महंगा बोझ बन सकता है।