शहजादी आबिदा सुल्तान का नाम भारत के इतिहास में साहस, विद्रोह और निडरता की मिसाल के रूप में दर्ज है। 28 अगस्त 1913 को भोपाल के नवाबी परिवार में जन्मीं आबिदा सुल्तान ने उस दौर में परंपराओं और रूढ़ियों को तोड़ा, जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना भी आसान नहीं था। घुड़सवारी, पोलो, शिकार, स्क्वैश और उड़ान भरने का जुनून रखने वाली आबिदा भारत की दूसरी मुस्लिम महिला पायलट बनीं। उनका जीवन प्रेरणादायी किस्सों से भरा है जो आज भी महिलाओं को हिम्मत और आत्मनिर्भरता की सीख देता है।
बचपन से निडर और साहसी
आबिदा का बचपन शिकार, घुड़सवारी और निशानेबाजी जैसे शौक में बीता। खिलौनों से खेलने की उम्र में उन्हें घोड़ों पर बैठाकर परवरिश दी गई। बचपन में ही उन्होंने बंदूक पकड़ना और निशानेबाजी सीखना शुरू कर दिया था। अपने जीवन में उन्होंने 73 शेरों का शिकार किया।
खेलों की दीवानी
आबिदा सुल्तान बेहतरीन खिलाड़ी थीं। 1949 में उन्होंने ऑल इंडिया विमेंस स्क्वैश चैंपियनशिप जीती। हॉकी और पोलो खेलना भी उन्हें बेहद पसंद था। उन्होंने भारत के महान पोलो खिलाड़ी राजा हनूत सिंह के साथ भी खेला।
विद्रोही शख्सियत
17 साल की उम्र में शादी के बाद भी उन्होंने परंपरागत जीवन नहीं अपनाया। एक बार उन्होंने अपने पति का सामना लोडेड रिवॉल्वर के साथ किया और कहा कि या तो मुझे मारो या मैं तुम्हें मार दूंगी। उनकी यह निडरता इतिहास में दर्ज है।
आसमान में उड़ने का जुनून
आबिदा को पायलट बनने का शौक बचपन से था, लेकिन पिता ने मना कर दिया। वे कलकत्ता भाग गईं और फ्लाइंग क्लब में एडमिशन लिया। बाद में बॉम्बे फ्लाइंग क्लब से ट्रेनिंग पूरी कर भारत की दूसरी मुस्लिम महिला पायलट बनीं।
जिंदगी भर रही जिंदादिली
70 साल की उम्र में भी उन्होंने स्विमिंग और टेनिस खेलना जारी रखा। उनके संस्मरण Memories of a Rebel Princess उनकी बगावती और प्रेरणादायी जिंदगी की झलक पेश करते हैं।