भोपाल में 1984 की गैस त्रासदी के बाद छोड़ा गया यूनियन कार्बाइड परिसर अब पूरी तरह जहर मुक्त करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़ा रहा है। 41 साल बाद राज्य सरकार ने करीब तीन करोड़ रुपये का एक्शन प्लान तैयार किया है, जिसके तहत दूषित मिट्टी और भूजल को वैज्ञानिक तरीकों से साफ किया जाएगा। इस कदम को भोपाल पर लगे उस गहरे जख्म को भरने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने लाखों जिंदगियों को प्रभावित किया था।
हाई कोर्ट के निर्देश के बाद तेज हुई प्रक्रिया
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के आदेश के बाद इस परियोजना को गति दी गई है। अदालत ने सरकार को सफाई का विस्तृत प्लान पेश करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास विभाग ने विस्तृत कार्ययोजना तैयार की है। सरकार का लक्ष्य है कि परिसर को सुरक्षित बनाकर भविष्य में उसके उपयोग की संभावनाएं खोली जा सकें।
वैज्ञानिक तरीके से होगी मिट्टी और पानी की सफाई
इस महाअभियान के तहत सबसे पहले विशेषज्ञ एजेंसी पूरे परिसर का वैज्ञानिक सर्वे करेगी। मिट्टी और भूजल के नमूने लेकर यह पता लगाया जाएगा कि जहरीले रसायन कितनी गहराई तक फैले हैं। इसके बाद सॉइल वॉशिंग, केमिकल ऑक्सीडेशन और आधुनिक ट्रीटमेंट तकनीकों से मिट्टी को शुद्ध किया जाएगा। दूषित भूजल को साफ करने के लिए पंप एंड ट्रीट सिस्टम का उपयोग किया जाएगा।
358 मीट्रिक टन जहरीला कचरा पहले ही हटाया गया
सरकार इससे पहले परिसर में मौजूद 358 मीट्रिक टन जहरीले कचरे को पीथमपुर भेजकर नष्ट कर चुकी है। अब बची हुई दूषित मिट्टी, पानी और जर्जर संरचनाओं को चरणबद्ध तरीके से हटाया और शुद्ध किया जाएगा। फैक्ट्री के पुराने पाइप, मशीनें और लोहे के ढांचे भी विशेष केमिकल ट्रीटमेंट से डीटॉक्स किए जाएंगे।
आसपास की बस्तियों को भी मिलेगा फायदा
परिसर में मौजूद रसायनों का असर लंबे समय से आसपास के भूजल और स्वास्थ्य पर पड़ता रहा है। इस सफाई अभियान से न केवल फैक्ट्री परिसर सुरक्षित होगा, बल्कि आसपास की बस्तियों में रहने वाले लोगों को भी राहत मिलने की उम्मीद है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे लंबे समय से चले आ रहे जोखिम कम हो सकते हैं।
स्मारक परियोजना का रास्ता होगा साफ
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसी वर्ष 17 जनवरी को परिसर का दौरा किया था। उन्होंने यहां करीब 1200 करोड़ रुपये की लागत से हिरोशिमा-नागासाकी की तर्ज पर भव्य स्मारक बनाने की घोषणा की थी। अब जब सफाई अभियान शुरू हो रहा है, तो इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए भी रास्ता साफ होता नजर आ रहा है।
1984 की त्रासदी की यादें आज भी ताज़ा
2-3 दिसंबर 1984 की रात यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से मिथाइल आइसोसायनेट गैस के रिसाव ने भोपाल को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी का गवाह बना दिया था। हजारों लोगों की जान गई थी और लाखों प्रभावित हुए थे। अब 41 साल बाद उसी जमीन को फिर से सुरक्षित बनाने की कोशिश शुरू हुई है।