भोपाल में आयोजित साहित्यिक महोत्सव एक बार फिर विवाद के केंद्र में आ गया है। भारत भवन परिसर में हो रहे आयोजन में ‘बाबर: क्वेस्ट फॉर हिंदुइज्म’ विषय पर प्रस्तावित सत्र को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। साहित्यिक बहस के नाम पर इतिहास के आक्रांता का महिमामंडन किए जाने का आरोप लगाते हुए हिंदू संगठनों ने विरोध तेज कर दिया है, जिससे आयोजन की मंशा और विषय चयन पर सवाल खड़े हो गए हैं।
सत्र के नाम से शुरू हुआ विवाद
विवाद की जड़ उस सत्र का शीर्षक बना, जिसमें मुगल शासक बाबर को केंद्र में रखा गया है। विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि बाबर जैसे आक्रांता को लेकर सत्र रखना सामाजिक समरसता के बजाय टकराव को बढ़ावा देता है। उनका तर्क है कि साहित्यिक मंच पर इतिहास की पीड़ाओं को नजरअंदाज कर किसी आक्रांता को वैचारिक चर्चा का विषय बनाना भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला कदम है।
पोस्टर बदले, पर सवाल बरकरार
विरोध के बाद आयोजन स्थल पर लगे पोस्टर में बदलाव किया गया, लेकिन इससे नाराजगी कम नहीं हुई। संगठनों का कहना है कि पोस्टर बदलना समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि मूल विषय और सोच वही बनी हुई है। उनका आरोप है कि यह बदलाव केवल दबाव कम करने की कोशिश है, न कि संवेदनशीलता दिखाने का संकेत।
हिंदू संगठनों की कड़ी चेतावनी
हिंदू उत्सव समिति और संस्कृति बचाओ मंच ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि बाबर से जुड़े किसी भी प्रकार के महिमामंडन को बढ़ावा दिया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन करेंगे। संगठनों ने आयोजकों से सत्र को निरस्त करने की मांग की है और प्रशासन से सख्त कार्रवाई की अपील की है।
इतिहास और साहित्य की बहस
विवाद के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि साहित्यिक मंचों पर इतिहास को किस नजरिए से प्रस्तुत किया जाए। एक वर्ग इसे अकादमिक विमर्श बताता है, तो दूसरा वर्ग मानता है कि कुछ विषय समाज में पुराने घावों को कुरेदने का काम करते हैं। इसी टकराव ने इस महोत्सव को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहला अवसर नहीं है जब इस साहित्यिक आयोजन पर विषय चयन को लेकर उंगलियां उठी हों। पूर्व में भी वक्ताओं और सत्रों को लेकर असहमति सामने आती रही है। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर आयोजकों की जिम्मेदारी और संवेदनशीलता पर बहस छेड़ दी है, जिससे आने वाले समय में ऐसे आयोजनों की दिशा तय हो सकती है।