उत्तराखंड की राजनीति के वरिष्ठ और प्रभावशाली चेहरों में शामिल पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी के निधन की खबर सामने आते ही पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई। बीते कई दिनों से उनके आवास पर राजनीतिक नेताओं, समर्थकों और परिजनों का आना-जाना लगातार जारी था। उनके निधन को उत्तराखंड राजनीति के एक बड़े अध्याय के अंत के रूप में देखा जा रहा है।
सेना से राजनीति तक का सफर
भुवन चंद्र खंडूड़ी ने सेना से सेवानिवृत्ति के बाद राजनीति में कदम रखा था। उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ाने में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अहम भूमिका मानी जाती है। राजनीति में आने के बाद उन्होंने कम समय में अपनी मजबूत पकड़ बनाई और पार्टी नेतृत्व का भरोसा हासिल किया। लोकसभा पहुंचने के बाद उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपी गईं।
सड़क विकास के लिए हमेशा याद किए जाएंगे
केंद्र सरकार में सड़क परिवहन मंत्री रहते हुए खंडूड़ी ने देशभर में सड़क और हाईवे परियोजनाओं को गति दी। उनके कार्यकाल में कई बड़े राजमार्गों का निर्माण हुआ और देश के सड़क नेटवर्क को नई दिशा मिली। आज भी उनके काम को बुनियादी ढांचे के विकास के लिए याद किया जाता है। माना जाता है कि उन्हें काम करने की पूरी स्वतंत्रता मिली थी और उन्होंने उसका प्रभावी उपयोग किया।
उत्तराखंड की राजनीति में मजबूत चेहरा बने
साल 2007 में उत्तराखंड भाजपा के भीतर बढ़ती गुटबाजी के बीच पार्टी नेतृत्व ने राज्य की कमान भुवन चंद्र खंडूड़ी को सौंपी। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में प्रदेश में प्रशासनिक सख्ती और साफ छवि की राजनीति को आगे बढ़ाया। उनके नेतृत्व को जनता के बीच भी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली और वे राज्य के मजबूत नेताओं में गिने जाने लगे।
राजनीतिक उतार-चढ़ाव के बीच लौटे सत्ता में
मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद भी खंडूड़ी की राजनीतिक अहमियत कम नहीं हुई। राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों और राजनीतिक अस्थिरता के दौर में पार्टी नेतृत्व ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताया और उन्हें दोबारा मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने अपने दूसरे कार्यकाल में भी प्रशासनिक अनुशासन और पारदर्शिता पर जोर दिया।
प्रदेशभर में शोक की लहर
भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन के बाद राजनीतिक और सामाजिक संगठनों में शोक का माहौल है। समर्थक उन्हें सादगी, ईमानदारी और अनुशासित नेतृत्व के लिए याद कर रहे हैं। उत्तराखंड की राजनीति में उनका योगदान लंबे समय तक याद किया जाएगा। उनके निधन से राज्य ने एक अनुभवी और प्रभावशाली नेता को खो दिया है।