बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण में इस बार वोटिंग ने सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। 18 जिलों की 121 सीटों पर हुए मतदान में 64.69 फीसदी वोट पड़े हैं, जो पिछले चुनाव की तुलना में करीब साढ़े आठ फीसदी अधिक है। बिहार के इतिहास में जब-जब वोटिंग में 5 फीसदी से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है, तब-तब सत्ता परिवर्तन हुआ है। ऐसे में इस बार का मतदान सत्ता समीकरणों को हिला सकता है।
. पहले चरण में मतदाताओं का उत्साह चरम पर
पहले चरण में बिहार के 18 जिलों की 121 सीटों पर 1314 उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई। मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर और वैशाली जैसे जिलों में सर्वाधिक वोटिंग दर्ज की गई, जबकि पटना में अपेक्षाकृत कम मतदान रहा। इस बार प्रदेश में 3.75 करोड़ वोटरों में से बड़ी संख्या में मतदाताओं ने मतदान केंद्रों तक पहुंचकर अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
वोटिंग बढ़ी तो बदली सरकार — पुराना पैटर्न
इतिहास गवाह है कि बिहार में जब-जब मतदान में 5 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ है, सत्ता बदली है। 1967, 1980 और 1990 के चुनावों में बढ़ी वोटिंग का नतीजा सत्ता परिवर्तन के रूप में देखने को मिला था। इस बार भी साढ़े आठ फीसदी मतदान वृद्धि ने सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है।
एनडीए और महागठबंधन की टेंशन बढ़ी
पहले चरण की 121 सीटों पर पिछली बार महागठबंधन ने 61 और एनडीए ने 59 सीटें जीती थीं। इस बार मुकाबला और भी दिलचस्प हो गया है। बढ़ी हुई वोटिंग को लेकर दोनों गठबंधन इसे अपने पक्ष में मान रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक ज्यादा मतदान सत्ता विरोधी लहर का संकेत भी हो सकता है।
बदले समीकरण, नए गठबंधन का असर
इस बार के चुनाव में समीकरण बदले हैं। चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा एनडीए के साथ हैं, जबकि मुकेश सहनी अब महागठबंधन में शामिल हैं। कई सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला है, जिससे परिणाम और अप्रत्याशित हो सकते हैं।
बढ़ी वोटिंग, बढ़ी सियासी गर्मी
इतिहास और आंकड़े बताते हैं कि जब जनता का उत्साह बढ़ता है, तो सत्ता परिवर्तन की संभावना भी बढ़ जाती है। पहले चरण की वोटिंग को देखते हुए कहा जा सकता है कि बिहार की सियासत एक बार फिर करवट ले सकती है। अब सबकी निगाहें 11 नवंबर को होने वाले दूसरे चरण के मतदान पर टिकी हैं।