बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई वोटर लिस्ट की विशेष पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया में कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसका समय उचित नहीं है। चुनाव से ठीक पहले 30 दिनों में इतने बड़े कार्य को पूरा करना न तो व्यावहारिक है और न ही पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। कोर्ट की यह टिप्पणी चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बड़ा संकेत मानी जा रही है।
समय पर नहीं की गई तैयारी: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विशेष पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाएं लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा हैं और जरूरी भी होती हैं, लेकिन इन्हें समयबद्ध तरीके से करना चाहिए। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब चुनाव नजदीक हैं, तब इतनी महत्वपूर्ण प्रक्रिया को केवल 30 दिनों में पूरा करना किस तरह व्यावहारिक हो सकता है?
पारदर्शिता पर उठे सवाल
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि वोटर लिस्ट में संशोधन की प्रक्रिया के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रक्रिया का उद्देश्य साफ हो लेकिन उसका क्रियान्वयन पारदर्शी और उचित समय पर होना चाहिए ताकि किसी भी मतदाता के अधिकारों का हनन न हो।
चुनाव आयोग से मांगा जवाब
कोर्ट ने चुनाव आयोग और बिहार सरकार से इस मामले में स्पष्टीकरण मांगा है कि क्या 30 दिन में पुनरीक्षण प्रक्रिया को निष्पक्ष और पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि वह इस पर आगे की सुनवाई में फैसला करेगा, लेकिन फिलहाल प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई गई है।